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कहीं गुमशुदा, गुमनाम है वो...

 


 

इंसान इंसानियत को माने,

कभी अपने अंदर भी झांके|

ढूढ़े खुद को भीड़ में कहीं

खुद को भी पहचाने|

इंसान इंसानियत को माने,

दूसरों के दर्द को समझे जो,

हर इंसान को इंसान समझे जो,

मजहब और धर्म से परे जो,

इंसानियत को सब कुछ समझे जो,

सच्चा इंसान है वो पर... पर... पर

अभी कहीं गुमशुदा, गुमनाम है वो|

@ मेखला

 

 

 

 

जल है तो कल है

याद रखो ये हर पल  है

अभी जो अविरल बहता

निर्झर, कलकल करता

घट जाऊंगा, उड़ जाऊंगा,

धीरे-धीरे गुम हो जाऊंगा

 

 

दर्द मुझे भी होता है

जब व्यर्थ मुझे यूँ खोता है

अगर ना जाना मेरा काम

ना रुक पाऊंगा खोके मान

 

निर्मल, निर्झर बहता पानी

कहता सबसे सुनो कहानी

कलकल-कलकल बहता जाऊं

गीत सुहाना सबको सुनाऊं

मेरा आना, जीवन लाता

मेरे बिन सब सूना हो जाता,

साथ न मेरा गर कोई पाता,

सारा जग बंजर हो जाता,

मुझसे लेता जीवन सांसे

मेरे बिन सूनी हैं आँखे

 

 

 

 

पानी बहता जाय और बदलता जाए

कभी सागर तो कभी नदिया कहलाए

पानी बहता जाय और बदलता जाए

राह के सूनेपन को हरियाली में रंगता जाए

 

 

 

ढलते- ढलते शाम ये कहती है

कल सूरज आएगा जरुर

तू उम्मीद का दामन थामे रहना

रौशनी से नहाएगा जरुर

न थकना, न रुकना,

न ठहरना, न बिखरना

तू उम्मीद का दामन थामे रहना

हर कदम पर खतरा है

ऐसा मत समझना

हर कदम पे रब संग तेरे बैठा  है

 

@ मेखला

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