जितने दूर, उतने
पास
इतने पास फिर भी दूर
ये एक दोस्त का विदेश
में रहने का अनुभव है। पर मैंने भी महसूस किया
है कि जब हम देश से बाहर जाते हैं तो हम सिर्फ भारतीय होते हैं।न.. न.. मैं कभी विदेश नहीं गई पर मैंने लोगों से सुना
है। विदेश में अपने देश का रंग भाता है। अपने जैसे लोगों को देखकर देश कि मिट्टी की
याद आती है। और ये सिर्फ बातें नहीं हैं, कई लोगों से सुनी कहानियाँ हैं जो उन्होंने
वहाँ जाकर महसूस की हैं।
वहीं देश में आते
ही हम राज्यों में बंट जाते हैं तू राजस्थानी, तू बिहारी, तू पंजाबी। अपने राज्य का इंसान अगर दूसरे राज्य में मिल जाए
तो अपनेपन की खुशी स्वयं छलक कर बाहर आ जाती है।
राज्य से शहर में
सिमट जाते हैं। कहने का मतलब हम जितने दूर जाते हैं उतने अपनों के पास आते हैं। उतना
ही उनका महत्व समझ पाते हैं।
कुछ समय पहले एक
पुरानी दीदी दोस्त से मुलाकात हुई दीदी दोस्त।
हां दीदी दोस्त,
क्योंकि उम्र में बड़ी थीं और मेरी सीनियर थीं, स्वभाव से मस्त थीं इसलिए जल्दी ही दोस्त
बन गईं थीं। तो वो हो गई थीं हमारी दीदी दोस्त।
उनकी शादी जिनसे
हुई थी वो किसी टूरिज़्म कम्पनी में थे जो साल दो साल में नए-नए देशों में तबादला कर
देते थे।
मैंने कहाँ आप
ठेठ राजस्थानी, शुद्ध शाकाहारी विदेश में
कैसे निभती थी।
क्योंकि तब तो
सोशल मीडिया भी नहीं था, जो सब दूर होकर भी पास नजर आते।
बोलीं मेखला सही बताऊँ
तो मैंने यहाँ से ज्यादा भारत को विदेशों में जाना है। लोगों का अपनापन, त्योहारों
की रौनक और उसमें अपनेपन की खुशबू यहाँ से ज्यादा वहाँ नजर आई।
बोलीं यहाँ अपने
पड़ोसी, पड़ोसी को नहीं पहचानते और न ही पहचानने की कोई ख्वाहिश होती। अजीब-सा सूखापन
हवाओं में घुला रहता है। वहीं बाहर जाओ तो
लोग आपकी चमड़ी से ही पहचान लेते हैं। दूर से ही देखकर आपके पास आ जाते है तुसी
इन्डियन हो न, जय श्री कृष्णा जैसे छोटी-छोटी चीजे आपको एक दूसरे से
ऐसे मिलवाती हैं, जैसे पता नहीं कब के बिछुड़े हुए हों। वहां असली छोटा-सा भारत मिलता है, जहाँ हर तीज
त्योहार बहुत ही प्यार से और पूरे विधि विधान से मनाये जाते हैं।
वहां हमारी पहचान
बस शुद्ध हिन्दुस्तानी के रूप में होती है।
बोली मैंने इतनी
जगह घूमी मुझे यहाँ से ज्यादा मजा फेस्टिवल मनाने का वहां आया।
पता है तुझे मैं
गणगोर पर कुछ सामान भूल गई थी, पड़ोस में रहने वाली पंजाबी आंटी ने देखते ही पूछा की
गल सी पुत्तर, तुसी बड़े परेशान दिख रहे हो?
मैंने बताया आंटी
गणगौर पूजा का कुछ सामान तो इंडिया में ही रह गया।
तो आंटी बोलीं पुत्तर
जी उस त्योहार का मुझे ज्यादा नहीं पता पर एक बार बता दे कैसे क्या करते हैं? फिर देख
सब मिलकर जुगाड़ कर लेंगे। इस बहाने हम भी गणगौर की पूजा कर लेंगे।
आंटी ने अपनी सखी
सहेलियों को बुलाया और देखते ही देखते मेरी पूजा की सारी तैयारियां हो गईं। सबने मिलकर पूजा
की खाना बनाया और खाया।
वहां हिन्दू,
मुस्लिम, सिख, ईसाई नहीं सिर और सिर्फ भारतीय होते हैं। जो अपने देश के लोगों से बहुत प्यार करते हैं
@मेखला
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