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कविताएं

 तितली

मैं नाजुक हूं मैं कोमल हॅू

फूलों की मैं सहचर हूं

घूम-घूम बगिया में नाचूं

बच्चों को मैं ललचाऊं

रंग -बिरंगी मैं लगती हूं

बच्चों के मन में रहती हूं

किसी को हूं नहीं सताती

सबके मन को हूं हर्षाती

 

 

एक अकेला चल सकता है

एक अकेला लड़ सकता है

जब एक साम्राज्य चला सकता है

तो तू क्यों नहीं अपना भाग्य जगा सकता है

 

जागकर भी सोये हुए

हसंकर भी रोये हुए

क्या यही शांति का पाठ है

क्या यही अंहिसावाद है

 

व्याधि से पीडि़त स्वदेश

उपचार सरल है एक उद्देश्य

एक ही शक्ति से बहृमाण्ड बना

 

लड़ाई है लड़ाई ,लड़ाई को छोड़ दो

पढ़ाई है पढ़ाई पढ़ाई पर ध्यान दो

है जिन्दगी दो पल की

तुम उस को सवार लो

 

फेरते हम जिससे आंखें

फिर भी रखता वो हम पर निगाहें

उचित अनुचित का  ध्यान दिलाकर

करता है वो हमको जागृत

सुना कहानी करो न बोर

हम देखेगें फैशन-शो

फैशन-शो से करेगें कॉपी

अपनी ड्रेसेज और भी छोटी

 

 

रिमझिम रिमझिम बरसा पानी

धरती को हर्शाता पानी

प्यार से हमको छू जाता पानी

बरखा का है ऐसा पानी

निर्मल निरझर बहता पानी

हमसे कहता एक कहानी

सूरज की गरमी से तपता

सागर का खारापन सहता

बादलों में घुटकर रहता

कभी किसी से कुछ ना कहता

बस प्यार से बहता रहता है।

 

 

चूं-चूं करती आई चिड़िया

सुनो कहानी मेरी भैया

भोर जगे मैं जग जाऊं

दाना चुगने मैं फिर जाऊं

दूर-दूर से दाना लाऊं

तब अपना खाना मैं खाऊं

तिनका-तिनका जब मैं लाऊं

उनको जोड़ घर मैं बनाऊं

करती जब इतनी मेहनत

रहती फिट तब एकदम

 

 

फूल-फूल पर तितली बैठी

उन्हें पकड़ने दौड़ी सोनी

जैसे ही पकड़ने जाएं

तितली झट से र्फुर हो जाएं

कलरफुल है तितली कितनी

मैं भी बनना चाहूं उतनी

सोनी ने जब जिद ये ठानी

मम्मी ने तितली की सुनाई कहानी

कैसे बनी कलरफुल तितली रानी

नाजुक और नरमदिल ये होती

फूलों का रस पीकर ये जीती

इनको नहीं सताना ठीक

ये है भोला-भाला जीव।

 

 

खरगोष गया जब जिम

उसमें थी कई मषीने और ट्रेडमिल

कसरत की और दौड़ लगाई

मन में एक इच्छा हो आई

कछुए से फिर षर्त लगाऊं

उसे हराकर जीत वापस पाऊं

कछुएं के घर जाकर   

जोर से आवाज लगाकर

खरगोष बोला कछुआ भाई- कछुआ भाई

कछुआ पीछे से बोला

क्या जिम जाॅइन करना है भाई।

 

 

 

चींटी बोली बन्दर मामा

सुनाओ कोई किस्सा पुराना

बन्दर चिंतित होकर बोला

बहुत सोचकर मुंह फिर खोला

क्या सुनाऊं तुझे कहानी

डरता हूं हो जाए ना परेषानी

मैं इंसानों का पूर्वज हूं

ये कहने से डरता हूं

इंसा की फितरत है बदली

इसलिए बार-बार डोले है धरती

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ठंडी हवा का झोंका