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इस बार कुछ ऐसा करते हैं

 

त्योहारों के आते ही कुछ बातें होने लगती हैं,

हर तरफ से कुछ ऐसी बरसातें होने लगती हैं।

 

संदेशे भेजे जाते हैं, जो फॉरवर्ड किये जाते हैं,

बात करने से मिलती थी जो ख़ुशी, वो कहीं गुम सी लगती है।

 

मावा नकली, दूध नकली, रंग भरी हैं मिठाइयाँ जी,

सेहत पर भारी है मीठा, इनको इग्नोर कर दो जी।

 

धुँआ-धुँआ करते हैं पटाखे, इनको न जलाना इस बार,

पर्यावरण को करते हैं प्रदूषित, सेहत जाती इनसे हार।

 

बंद करो हलवाइयों से बनी मिठाइयां लेना,

स्टारों ने जो बोला वो ही चॉकलेट लेना, विज्ञापन दिखने लगते हैं।

 

चल रहा चॉकलेट, नमकीन और बेकरी के बिस्कुट का दौर,

जो अब कर रहा है सबको बोर, पर कैसे करें इनको इग्नोर।

 

तो चलिए इस दिवाली हम भी कुछ ऐसा करते हैं,

मैसेज कर नहीं, फोन पर बात कर दिवाली की शुभकामनाएं देते हैं।

 

लड्डू और बर्फी से मुंह मीठा करते हैं,

जो चॉकलेट्स से कम ही नुकसान करते हैं।

 

सब एक साथ आतिशबाजी का मजा लेते हैं,

कानफोडू बम नहीं अनार और फुलझड़ी जलाते हैं।

 

इस बार विज्ञापनों पर नहीं अपनों पर भरोसा करते हैं,

सालभर जिनसे लेते रहे उनसे ही मीठा लेते हैं।

 

रिश्तों को कीमतों में तौलते उपहारों को बंद करते हैं

एक-दूसरे से मिलते हैं और खुलकर हँसते हैं।

इस बार कुछ ऐसा करते हैं,

कुछ हटकर पुराने दिनों को ताजा करते हैं।

  @ मेखला

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