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आज भी याद आती है उसकी...

 


 

ये  नवंबर 2008 की बात है| कड़क सर्दी की रात थी, जब ये ऑफिस से लौटे तो थोड़े से परेशान थे
मैंने पूछा क्या हुआ?

तो बोले रहने दो घर में किसी को अच्छा नहीं लगेगा

क्या अच्छा नहीं लगेगा? और क्यों अच्छा नहीं लगेगा?

हुआ क्या मैंने थोड़ा सा जोर देकर पूछा

मेरी बात का जवाब ना देते हुए अनमने से होते हुए बोले कोई मोटी दरी और बेकार गर्म कपड़ा रखा है क्या ?

मैंने गुनगुना पानी देते हुए कहा हुआ क्या है कुछ तो बताओ

बोले बाहर एक पिल्ला ठंड में सिकुड़ा सा पड़ा ऐसा लग रहा जल्द ही कुछ गर्म नहीं दिया तो... ये कहते हुए ये वाशरूम चले गए|

मैं उन दिनों बेड रेस्ट पर थी और मुझे ज्यादा तेजी से चलना फिरना भी मना था , उनकी बात सुनकर मैं खुद को रोक नहीं पाई और दौड़कर गेट पर आकर देखा तो मासूम सा निरीह छोटू आवाज सुनकर आंखों  को उठाकर देखने की कोशिश करने लगा, शरीर में जैसे जान ही नहीं थी पर अपना पूरा दम लगा कर कूंक रहा था|

मैंने तुरंत एक कम्बल लेकर उसे उड़ाया और घर के अंदर ले आई|

मुझे वैसे पेट्स पालने का कोई शौक नहीं था और ना ही मैंने कभी किसी के पेट्स को छुआ था बहुत डर लगता था|

पर उसको उठाकर अंदर ले आई| कैसे? नहीं जानती|

मुझे देखते ही बोले, तुम सोचने से पहले काम करने लगती हो,  मैं आ तो रहा था | दोनों ने मिलकर उस छोटे से मेहमान  कि खातिर की |

गरमाहट पाकर और पेट में थोड़ा सा खाना जाने से उसमें भी थोड़ी सी हलचल हुईऔर चेहरे पर सुकून सा आया

मैंने इनको कहा तुमको तो पता है मुझे पेट्स के बारे में कुछ भी नहीं पता| इसको क्या-क्या और कैसे-कैसे करना है? मुझे कुछ नहीं आता और भैया-भाभी भी नहीं जानते कैसे संभालेंगे इसको? तो ये ऑफिस जाते तो उसका कुछ काम करवा कर जाते| और खाने में क्या देना है भी बता गये थे|

3-4 दिन में वह ऐसा हो गया था, जैसे यहाँ कब से रह रहा हो| हमने उसका नाम भी रखा था टाइगर, जेठ जी के बच्चे और मैं तीनों उसके कामों में व्यस्त हो गये थे| इसको कैसा बिस्तर चाहिए?

गत्ते के डिब्बे से कैसे घर बनाएं हम इस जुगाड़ में लगे रहते|

भाभी कभी कभी झुंझलाती हुई बोलती तुम भी ना मेखला, पता नहीं चलता इस घर में दो बच्चे हैं की तीन|

डॉक्टर ने कहा है ना ज्यादा भागमभाग नहीं करनी फिर क्यों इसके पीछे भाग रही हो?

मैं चुपचाप कमरे में आकर बैठ जाती | उसको भी पता नहीं क्या था आकर बेड के साइड में बैठ जाता पूंछ हिलाने लगता|

रविवार को जब सब घर पर थे ये उसको धूप में बिठाकर आ गये| वह भी छत पर आराम से धूप सेंकने लगा था| दोपहर के खाने के लिए मैंने इनको आवाज दी और पूछा टाइगर को खाना दिया क्या?

 

बाहर से आते हुए ये बोले धूप में से नीचे ही नहीं आया क्या अभी तक?

देखता हूँ कहीं सो तो नहीं गया ?

देखा तो वह कहीं नहीं था| आस पास जाकर भी देखा पर वो कहीं नहीं मिला|

पर एक सुकून था की उसे जिन्दगी दोबारा मिल गई थी |

 

मेखला गुप्ता

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