पापा के कड़क किस्से
पापा का गुस्सा हमने जितना देखा था, उससे ज्यादा उसके बारे में सुना
था।
पापा को हमारी बीबी (दादी) दुर्वासा कहती थीं। इसरी (ईश्वर पापा का
नाम) तो दुर्वासा का रूप है। कब गुस्सा आ जाए पता ही न चलता। पापा की जगह मम्मी से
उनकी बहुत पटती थी । मम्मी थी भी ऐसी हीं कि
कोई भी उनसे बात करके दुखी नहीं रह सकता था। उस जमाने में जातियां इंसान पर भारी पड़ती
थीं पर तब भी माँ ने सबका दिल जीत लिया और सबके मुँह से एक ही आवाज निकलती थी सुशीला
जैसी कोई नहीं। मम्मी के किस्से अगले अंकों में सुनाऊँगी।
पापा जितने गुस्से वाले मम्मी उतनी ही शांत। कुछ भी पूछना
हो तो बीबी मम्मी से ही कहतीं रे सुसिला तू ही पूछ इसरी से। वो अलग बात है कि पापा ने बीबी और लालाजी (दादाजी)
के आगे कभी ऊंचा नहीं बोला और न ही कभी उनकी बात टाली थी। लेकिन फिर भी बीबी बहुत डरतीं
थीं।
पापा स्वभाव से गुस्से वाले थे और उस पर टीचर भी बन गए थे, तो सोने
पर सुहागा।
पिताजी का मानना था नियम सभी के लिए एक जैसे ही होते हैं और उनका पालन
भी सबको एक जैसे ही करना चाहिए। इसको
कठोरता से अपने जीवन में मानने वाले पिताजी कई बार उसके अंजाम भी सह चुके थे। इसके
लिए वह स्कूल प्रशासन से भी कई बार भिड़ चुके थे, जिसका
नुकसान भी उनको झेलना पड़ा था।
पापा स्कूल में बच्चों के लिए एक अच्छे गुरू थे, जिनका रिजल्ट कई बार शत-प्रतिशत भी जाता था, वो भी उस समय के अंग्रेजी
साहित्य में। दसवीं-बाहरवीं का रिजल्ट 90-100 प्रतिशत तक जाना
वो भी अंग्रेजी में अन्य लोगों के लिए जलन का विषय भी बन जाता था।
बात तब की है जब पापा अग्रवाल स्कूल में 10 वीं और 12 वीं क्लास को अंग्रेजी पढ़ाते थे। पापा
स्कूल में चाय वगैरह पीने में अपना टाइम नहीं लगाते थे, वो
देसी चीजों को जीवन में अपनाते थे इसलिए उतने रूपये ताजी मौसमी सब्जियां खाने में
लगाते थे।
सर्दी के दिन थे। बच्चे और बड़े इंटरवल होते ही धूप
में आ गए थे। पापा लंच टाइम में स्कूल के
बाहर खड़े ठेले से ताजी और पतली-पतली मूलियां लेकर आ रहे थे । एक स्टूडेंट जो अपने
दोस्त के साथ खड़ा था, उससे बोला काश इनमें से एक मूली मिल जाए, तो मजा ही आ जाए।
कहा तो उसने धीरे से ही था पर पापा के कान तक उसकी आवाज पहुंच गई थी।
उन्होंने लड़के को आवाज दी।
वो डरते-डरते बोला सॉरी मास्टरजी। गलती हो गई, मैंने कुछ नहीं कहा।
पापा का प्यार भी कुछ-कुछ पापा की ही तरह था- दिखने में कड़क और दिल
से एकदम नरम। उनका लाड़, लाड़ कम गुस्सा ज्यादा नजर आता था। तेज आवाज में बोले इधर आओ।
वो राम का नाम जपते हुए पापा के पास पहुंचा और बोला गुरुजी कुछ नहीं
कहा, गलती हो गई।
पापा बोले जो भी तुझे पसंद है वो मूली निकाल बैग से।
नहीं गुरुजी! मैं तो बस मजाक कर रहा था।
पापा कड़क आवाज में बोले, उठा मूली।
डरते-डरते उसने मूली उठाई।
पापा बोले अब पलट और भाग ले। उसके जाते ही पापा के चेहरे पर एक प्यारी
सी मुस्कान आ गई जिसे हमारे एक कजिन जो कि उसी स्कूल में थे ने देखी और हमें वो किस्सा
सुनाया। कुछ किस्से तो उन भईया को ऐसे याद थे कि जब भी मिलते सुनते-सुनाते वक्त कब
निकल जाता था, पता ही नहीं चलता था। कुछ ऐसे ही थे पापा के कड़क किस्से ।
@ मेखला गुप्ता
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