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काश कुछ कर पाती....


पहली बार उनको देखा था भरी हुई, खुशमिजाज| मैं मम्मी के साथ ही स्कूल आती-जाती थी इसलिए जब किराये का घर देखने की बारी आई तो भी साथ में ही आ गई थी| पापा भी अपने स्कूल से आ गये थे| आइये मास्टरनी जी ये है किराये वाला पोर्शन सामने एक अच्छे डीलडौल वाली महिला, जिसके चेहरे से सम्पन्नता टपक रही थी और बोली में गर्वीली खनक थी| आपके परिवार में और कौन-कौन हैं, सास जी क्या साथ में ही रहती हैं, जैसे कई प्रश्न उन्होंने मिनटों में मम्मी से पूछ डाले थे| पापा की ओर मुड़ते हुए और मास्टरजी आप कौनसे स्कूल में हैं ? कबसे जयपुर में हैं? जैसे सवालों की  सुई पापा की ओर मोड़ दी थी|

मम्मी पापा के जवाबों से तसल्ली में आती हुई बोली, आप तो जानते ही हैं आजकल तो घर किराए पर देने के लिए भी काफी मशक्कत करनी पड़ती है| दोनों ने स्वीकृति में गर्दन हिला दी|

 आवाज में कड़कपन या यूँ भी कह सकते हैं थोड़ी दबंगई भी थी मिजाज में| कोई भी देखे तो रश्क करने लगे नसीब पर| भरा पूरा खुशहाल परिवार (बाहर से तो ऐसा ही दिखता था) | हों भी क्यों ना जो माँ अपने तीन बेटों और चार बेटियों के भरे पूरे परिवार और अपने पोते-पोतियों और नाते-नातिनों से घिरी हों उनको ऐसा होना जायज था| पैसों की बारिश और हर तरह से सम्पन्नता का बरसना| खुद की कोठी जयपुर की प्राइम लोकेशन पर| बेटे तीनों एक से बढ़कर एक पोस्ट पर| बेटियों अपने अपने घरों में सुखी और सम्पन्न थीं|  दामाद भी कमाने खाने वाली पोस्ट पर जो तैनात थे|

पर वक्त बदलते देर नहीं लगती| उनके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ| उनके पति जिन्हें हम बाबा जी कहते थे जो की एक अच्छी पोस्ट पर से सेवानिवृत हुए थे का परिवार पर ख़ासा दबदबा था| अचानक उनकी डेथ ने जैसे घर भर की दुनिया ही बदल दी| बहुओं के लिए थोड़ी कड़क सास की आवाज बाबा के जाते ही झटक गईं| बाबा जी के जाते ही तीनों बेटों की लगाम भी खुल गई और तीनों स्वछन्द हो गए थे|

बहुएं भी जो ससुर जी के सामने सास को कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर पाती थीं अब अपने रुआब पर आ गई थीं| सास की आवाज को अनसुना करना आदत में शुमार हो गया था|

उसपर सासु जी यानी बा एक दिन नहाते हुए फर्श पर गिर पड़ीं और कूल्हे की हड्डी टूट गई| बस और भी ज्यादा बुरे दिन शुरू हो गए| पहले पहल तो सबने थोड़ा-थोड़ा ध्यान भी दिया, लेकिन समय के साथ उनकी हालत नाजुक होती गई और उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया| प्रॉपर्टी उनके नाम थी इसलिए इतनी सेवा भी हो रही थी पर बेटों ने तिकड़म से कागजों पर साइन कराए और बस रही सही कसर पूरी कर दी| अब तो बेटियां भी माँ के नाम से मिलने तो आती पर माँ के हाल चाल से ज्यादा भाभियों से वापसी में क्या लेकर जाएंगी पर ज्यादा ध्यान देने लगीं|

बा बड़े कमरे से निकलकर दालान के एक छोटे से कमरे में शिफ्ट कर दी गईं, जिसमें सुविधाओं के नाम पर एक पलंग और एक पंखा था| अब वो पुकारती रहती और कोई सुनने वाला नहीं होता| हम चुपके से कुछ दे आते तो थोड़ी देर में आकर गले पड़ जाती बहुएं, हां क्या दिखाना चाहती हो की हम उनका कुछ ध्यान नहीं रख रहे| आपको हमारे घर के मामले में नहीं पड़ना चाहिए| बेहिसाब लड़ाई और वो भी तब जब सामने से कोई जवाब ही नहीं देता हो | खाने की मात्रा दिन ब दिन कम की जाने लगी| अरे ज्यादा खाएंगी तो फिर गंदगी भी करेंगी| नहलाना धुलाना भी ऐसा हो गया कि सप्ताह में एक बार| सर्दी हो या गर्मी पानी ठंडा ही होता| साफ़ करने और साबुन लगाने के लिए सींक वाली झाड़ू का इस्तेमाल किया जाने लगा| बेशर्मी फूट-फूट कर बाहर आ रही थी|  कुछ समय में ही गदराई हुई बा हड्डियों का ढांचा मात्र रह गईं थीं, जिनको ना अपनी सुध थी ना किसी और की| एक को आवाज देने लगती तो वो तब तक देती रहती जब तक नींद आगोश में न ले ले|

हम लोगों के हलक में खाना अटकने लगा था| हमारे परिवार की बैचेनियाँ बढ़ने लगी थी| अड़ोसी पड़ोसी घर बदलने की सलाह देने लगे थे |

 मैनें तब तक नौकरी शुरू कर दी थी और वो भी अख़बार में सोचा क्यों ना शिकायत कर दूँ कुछ तो आराम पड़ेगा बा को| पर जहाँ-जहाँ गई सबने एक स्वर में कहा केस ही नहीं कर सकते उनका दामाद बहुत बड़ा क्रिमिनल लोयर है और उनके बेटे भी खासी ऊँची पोस्ट पर हैं शिकायत दर्ज होने से पहले खारिज कर देंगे| मैडम जी आपको अभी कोई अनुभव नहीं है इसलिए जो जैसे चल रहा है चलने दीजिये पर ये कसक अक्सर दिल में उठती है की काश मैं कुछ कर पाती|

 

मेखला गुप्ता

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