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ख्वाहिश

 

आज लिख रही हूँ अपनी ख्वाहिश

होगी भी या नहीं होगी पूरी, इसका भी कुछ पता नहीं

मिलना चाहती हूँ रतन टाटा सर से और आनंद महेंद्रा सर से

पर सोचती हूँ जब भी ऐसा, खुद ही खुद से करती हूँ सवाल

जब मैंने कुछ हटकर किया नहीं, दुनिया को कुछ दिया नहीं

सिमटी हूँ अपनी दीवारों में, फिर कैसे मिल सकती हूँ इन दिव्य इंसानों से

 

किया नहीं ऐसा कुछ मैंने, जो देखूं कुछ ऐसे ऊँचे सपने,

पर सपने तो सपने होते हैं उनके पर जो होते हैं|

मेखला गुप्ता

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