क्यों इंसान पत्थर जैसा हो रहा है
इंसानी काया में इंसानियत का खात्मा हो रहा है|
जहाँ कभी बहते थे दूसरे के दर्द को देखकर आंसू
वहां अब कुटिलता का आशियाना हो गया है
क्यों इंसान पत्थर जैसा हो रहा है
माँ का दर्द समझ नहीं आता
या कहीं माँ को बच्चा नजर नहीं आता
पिता का प्यार क्यों नहीं लुभाता
जायदाद से प्यार ज्यादा हो गया
भाई-बहन का प्यार भी छलावा हो रहा
हर रिश्ते से जैसे खिलवाड़ हो रहा
मायूस हैं नजरें, गुमसुम है दिल
इंसान क्यों नहीं बन रहा इंसानियत के काबिल
मेखला गुप्ता
इंसानी काया में इंसानियत का खात्मा हो रहा है|
जहाँ कभी बहते थे दूसरे के दर्द को देखकर आंसू
वहां अब कुटिलता का आशियाना हो गया है
क्यों इंसान पत्थर जैसा हो रहा है
माँ का दर्द समझ नहीं आता
या कहीं माँ को बच्चा नजर नहीं आता
पिता का प्यार क्यों नहीं लुभाता
जायदाद से प्यार ज्यादा हो गया
भाई-बहन का प्यार भी छलावा हो रहा
हर रिश्ते से जैसे खिलवाड़ हो रहा
मायूस हैं नजरें, गुमसुम है दिल
इंसान क्यों नहीं बन रहा इंसानियत के काबिल
मेखला गुप्ता
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