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वजूद मां से तो मां का आधा हिस्सा रहेगा

विनीता इतनी उदास क्यों हां मैंने ऑफिस आते हुए नीचे टहल रही विनीता से पूछा तो बोली नहीं वैसे ही। धीरे धीरे बातें बढ़ने लगीं तो दोस्ती हो गई। सरकारी स्कूल में टीचर और दूसरों की काउंसलिंग करने वाली खुद को अपने घर के माहौल से निकाल नहीं पा रही थी। एक दिन मुझे पार्क में बैठाकर बोली यार ऐसा क्यों होता है कि शादी के बाद जिंदगी उलट पलट जाती है। मैंने जरा सी तसल्ली दी तो फूट फूट कर रोने लगी। मैंने कहा दिल का गुबार बोलकर हल्का कर लो। तो बिना ना नुकर के अपना दुखड़ा बताने लगी।
शादी के बाद बिलकुल अलग माहौल में आई। पहले जहां ससुराल और मायका किताबों में पढ़ा था वहीं अब देखने और सुनने को मिलने लगा। ये तुम्हारा घर है। मायके को याद करना कम करो। मायका साल में एक बार जाते हैं, वो भी कुछ दिनों के लिए।
शादी से पहले मामला बिलकुल बदला हुआ था। हम आराम से मौसी के आते थे मौसी आती थीं। ताउजी,  चाचा वगैरह आते तो वो भी मौसी के यहां आने जाने में कोई गुरेज नहीं करते थे। ऐसे जैसे अपने घर में जा रहे हों। ना बुलाने का कायदा, ना कोई फॉर्मेलिटी। जब जिसका मन किया आया हां आदर सत्कार वो भी पूरे प्यार के साथ घर में जो बना हो खाना। कुल मिलाकर बहुत खुलापन था। सुसराल में आकर पता चला दुनिया बिलकुल बदली हुई होती है। हर दिन कुछ नया अनुभव और नया ज्ञान प्राप्त होता था।
पर इन सबमें साथ देने के लिए सासू जी साथ होती थी क्योंकि वो मुझसे खुद को रिलेट कर पाती थी ऐसा मुझे लगता था।
त्योहारों की तैयारी में हम नए-नए एक्सपेरिमेंट करते।
एक दिन बात करते करते बोलीं बेटा अपने यहां तो त्योहारों पर कुछ अलग ही मजा आता है।
तभी दोनों बेटे सामने आकर खड़े हो गए क्या मां अब तो आपको इस घर को अपना मानना चाहिए। अब आपका गोत्र वो नहीं रहा बदल गया है।
हां बेटा मैंने कब कहा लेकिन मैं तो इससे अपने घर की बात कर रही थी।
आपका घर ये है वो तो नानाजी का था।
मेरे चुप न रहने की प्रवृति ने एक बार फिर मुंह उठाया और मैं बोली पर आप लोग आधे अग्रवाल हैं। मां का वजूद आपसे नहीं आप सबका वजूद मां से हैं। पिताजी का आधा हिस्सा और आधा है तो मां का आधा हिस्सा भी रहेगा।
तुम तो रहने हमेशा झांसी की रानी का झंडा लेकर खड़ी हो जाती हो।
जैसे तैसे मां ने बात को समेटा और वातावरण को हल्का करते हुए बोलीं अरे भई अभी खाने में क्या-क्या बनाना बाकी रह गया।
उनके रहते तनावपूर्ण माहौल मिनटों में कैसे सामान्य हो जाता था पता ही नहीं चलता था।
लेकिन जैसा कि मुझेे सोचने के लिए मुद्दा मिल गया था और मैं उस बात को गुनने लगी।
लड़की का वजूद क्या पोर्टेबल होता है, जहां मर्जी आया फिक्स कर दिया फिर हटा दिया। एक लड़की औरत बनते ही अपने पुरानी केंचुली से निकल कर दूसरी केंचुली ओढ़ लेती है। क्या उसका कोई वजूद नहीं।
हां लड़कियों के लिए जब मन आए घर आओ और वही बहू को लेकर ना ना रोज रोज कौन मायके जाता है।
तीज त्योहार बहनों के आने से सजते हैं और बहू जाने के लिए कहे तो घर सूना करके कौन जाता है भला तुम तो अपने ही राग अलापती हो। कुल मिलाकर एक ही घर में दो ढफलियां बजती थीं। अब ऐसे माहौले में खुद को संभाले रखना बहुत मुश्किल हो रहा है।
मैंने कहा खुद को इतना व्यस्त कर लो कि और कुछ सोचने का वक्त ही ना मिले और वैसे भी लोग तो कहते हैं और कहते रहेंगे लोगों की परवाह करना छोड़ आत्मनिर्भर बने रहो।

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