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गुम हो गई घड़ी

 गुम हो गई घड़ी

मैं जब दसवीं में आई थी, तो मम्मी ने एक बहुत अच्छी वाली घड़ी मुझे गिफ्ट की। वैसे तो और भी कई गिफ्ट मिल चुके थे पर इस गिफ्ट से मुझे कुछ ज्यादा ही लगाव था। वह घड़ी मेरी छोटी बहन को भी बहुत पसंद थी। एक दिन वह उसे स्कूल पहनकर गई। वहां न जाने कैसे उससे वह घड़ी गुम हो गई। मैं शाम को घर आई तो मैंने पूछा घड़ी कहां है? बोली जीजी इधर ही रखी थी देती हूं। उसने उठकर घड़ी देखने का ड्रामा किया और बोली अरे घड़ी यहां तो दिख नहीं रही। फिर हमने उस पूरे कमरे को छान मारा। बोली कही चूहा तो नहीं ले गया। पर चूहे तो घर में थे ही नहीं। खैर उस घड़ी को लेकर मेरी बैचेनी बढ़ती जा रही थी और वह मुझे दिलासा दिए जा रही थी, जीजी अभी मिल जाएगी। मैंने तो यहीं रखी थी। पर उसके चेहरे पर छाई बैचेनी और घबराहट छाई हुई थी। तभी एक दिन वह अपना लंच भूल गई। पापा उसका लंच देने स्कूल गए तो चौकीदार बोला सर जी अभी घड़ी नहीं मिली है। पापा बोले पर मैं तो लंच देने आया था। पापा ने स्टाफ को लंच पकड़ाया तो प्रिंसीपल उधर से गुजर रही थी। पापा को जानती थी बोली अरे सरन साहब अभी घड़ी नहीं मिली है। पापा को घड़ी की कहानी नहीं पता थी तो उन्होंने पूछा कौन सी घड़ी? उन्होंने कहा पल्लवी जो घड़ी पहनकर आई थी वो खो गई है न। उसने मिसिंग की शिकायत की थी। हमने स्कूल में खोज ली है, कहीं नहीं मिली। पापा को अब कुछ-कुछ बात समझ आने लगी। छोटी बहन को पता चल गया था कि पापा को घड़ी की कहानी पता चल गई है। उसने पापा को आकर धीरे से सारी बात बता दी। बोली पापा जीजी की बहुत प्यारी घड़ी थी और मुझसे खो गई थी इसलिए मैं डर गई थी। उसने कहा मुझे लग रहा था कि मिल जाएगी, तो जीजी को जाकर सब बता दूंगी। पापा ने मुझे बुलाया, तो पहले ही वह सॉरी कहते हुए आगे हो गई। पापा ने कहा कि इसको कुछ मत कहना इससे वह घड़ी गुम हो गई है। पापा-मम्मी ने समझाया कि गिफ्ट तुमसे बड़ा नहीं है और अगर उतुम ही बिगड़ गए तो सब बेकार हो जाएगा। उन्होंने हम तीनों बहनों को एक साथ बुलाया और कहा कि कुछ भी हो जाए। सामान कितना ही महंगा क्यों न हो अगर उसके साथ कुछ हो जाए तो कोई नहीं। तुम तीनों एक दूसरे का ध्यान रखना। चीजों का ध्यान रखो पर उनके लिए अपनी जान जोखिम में मत डालना। ये चीजें वापस आ सकती हैं। उस दिन के बाद जब भी घड़ी का जिक्र आता है, तो वह घड़ी बहुत याद आती है।


नॉनवेज के शौकीन को जब खिलाया वेज खाना
सालों बाद मम्मी के ननिहाल जाने का मौका मिला तो बहुत मजा आया। जयपुर से हैदराबाद आज भले ही दूर न लगे पर 20 साल पहले वहां जाना विदेश भ्रमण जैसा लग रहा था। हैदराबाद और वहां के कल्चर को बस सुना ही था देखने और महसूस करने का मौका तो तब ही मिला था। शादी के मौके पर गए थे इसलिए घर भर में काफी गहमागहमी थी। वहां की भाषा और खानापीना हमारे यहां से बिलकुल अलग था। उनको हमारी भाषा और हमें उनकी भाषा सुनने में बहुत मजा आ रहा था। वहां के लोग बार-बार यह कहने में लगे थे ‘तुमे मिले क्या ऊनो नार्थ से आए’। वहां हम वीवीआईपी गेस्ट थे। एक तो नार्थ से ऊपर से शाकाहारी। ऊनो अंडा भी नई खाते, बोलो! वहां एक मामी भी मिली जिनसे हम पहली बार मिल रहे थे। उनका बेटा जो छह साल का रहा होगा मुझे दीदी की बजाए मौसी ही बुला रहा था। बार-बार घूमफिर कर आए और बोले मौसी अब यहां घुमाओ, ये खिलाओ। मामी बार-बार उसको बोलती मौसी नहीं दीदी हैं पर उसे तो बस रट सी लग गई थी। मुझे भी उसके साथ खेलने में काफी मजा आ रहा था। उसको नॉनवेज बहुत पसंद है ऐसा मामी ने बताया था। मैं शुद्धशाकाहारी। एक दिन खाने में जब सब बाहर आए तो बोला मैं तो मीतू मौसी से ही खाउंगा और चिकन ही खाउंगा। मैं अंडे से भी दूर रहने वाली चिकन तो बहुत दूर की बात थी। उसकी मम्मी यानी मामी ने कहा मैं खिला देती हूं, दीदी पास बैठ जाएंगी। वह अड़ गया मीतू मौसी से ही खाना खाना है। मैंने कहा अगर दाल चावल खाने है, तो खिला सकती हूं, चिकन नहीं। उस दिन उसने अपने फेवरेट चिकन को छोड़कर मेरे हाथ से दाल चावल खाए। मामी आश्चर्य से देखती हुई बोली पहली बार ऐसा हो रहा है जब यह नॉनवेज छोड़कर तुमसे दाल चावल खा रहा है। नहीं तो नॉनवेज के आगे यह वेज देखता ही नहीं। आज भी जब हम मिलते हैं, तो उस बात को याद करके हंसते हैं।


8 नवंबर

अब भी याद आते हैं वो खूबसूरत फूलदान
मम्मी-पापा टीचर थे, लेकिन पापा को बिजनेस करने का भी मन करता था इसलिए जब भी मौका मिलता वे कुछ न कुछ ऐसा करने की कोशिश जरूर करते थे। कभी कुछ सामान, तो कभी कुछ सामान। वो अलग बात है ये सामान बिकते कम बंटते ज्यादा थे। ऐसे ही एक बार पापा पीतल के बड़े-बड़े डिजायनर फूलदान ले आए, जिसमें से तीन-चार फूलदान मम्मी ने घर के लिए निकाल लिए और बाकी के परिवार के लोगों को देने के लिए निकाल कर अलग रख दिए। पापा, मम्मी को उन सब फूलदान के रेट बताने लगे कि देखो मैं कितने सस्ते में ले आया। मैं भी इंटरेस्ट लेकर बात सुन रही थी। बात खत्म हो गई। दो दिन बाद जीजी को ट्यूशन पढ़ाने सर घर आए। जब भी आते तो पढ़ाने के बाद कुछ देर पापा के साथ चाय वगैरह भी पीते थे। बातों-बातों में पापा से बोले सरन साहब अब कुछ नया सामान नहीं ला रहे हो क्या? तभी उनकी नजर साइड में रखे फूलदान पर गई। बोले ये क्या है?
पापा ने बताया कि यह फूलदान हैं, जो घर के लिए लाया हूं। फूलदान देखकर सर बोले इसे मैं ले जाता हूं। पापा ने कहा ये बेचने के लिए नहीं है घर के लिए है। तो हंसते हुए बोले मैं तो इसे लेकर ही जाउंगा। पापा ने टालने के लिए कहा बहुत महंगा है। बोले कुछ भी हो लेकर तो रहूंगा। आप रेट बताओ। पापा ने वैसे ही ऊंचे रेट बता दिए। मैं भी तभी पहुंच गई और अपनी समझदारी दिखाते हुए बोली पापा इसके तो ये रेट नहीं हैं।
सर ने कहा हां-हां बेटा बताओ, बताओ।
मैंने पापा से जो रेट सुने बता दिए। सर पापा से एक के बजाए तीनों फूलदान लेकर चले गए। उसके बाद पापा ने कहा बेटा ये मैंने उनको मना नहीं कर पा रहा था इसलिए ये रेट बताए थे। उन फूलदान के जाने का दुख काफी अर्से तक सताता रहा।


9 नवंबर

आप मुझे डांटोगे?
25 साल पहले की बात है। तब हमारे शहर में स्कूटी के नाम पर आती थी ‘सनी’ जो कि बहुत ही हल्की होती थी। पापा ने छोटी बहन को दिलवाई की उसके कॉलेज जाने के लिए तुझे उससे काफी राहत मिल जाएगी। वह इतनी हल्की टू-व्हीलर था कि जब देखो तब स्लिप मार जाती थी। छोटी बहन उससे कुछ ही दिनों में कई बार स्लिप कर गई। एक दिन की बात है थोड़ी जल्दी हो रही थी, कॉलेज जाने की तो उसने स्कूटी को रेस दे दी। अब हल्की होने की वजह से कंट्रोल नहीं कर पाई और आगे खड़ी हुई लंबी वाली गाड़ी को टक्कर मार दी। अचानक हुए इस हादसे से डर कर जहां थी, वहां ही जम गई। गाड़ी में बैठा लंबा-चौड़ा शख्स गुस्से से तमतमाता हुआ बाहर आया और जैसे ही उसके आगे कुछ बोलता बहन ने वही रोना शुरू कर दिया और कान पकड़कर सॉरी बोलते हुए बोली अब आप मुझे डांटोगे। इतना सुनते ही गुस्से में तमतमाते हुए शख्स को भी हंसी आ गई। बहन को रोता देखकर उस शख्स ने पास ही में लगी प्याउ से पहले उसे पानी पीने और मुंह धोने के लिए कहा। थोड़ा रिलेक्स होने के बाद एक बार फिर बहन ने गाड़ी वाले से सॉरी कहा और कॉलेज के लिए चल दी। घर आकर उसने जब अपने साथ हुई आपबीती बताई, तो हम सबके हंसते-हंसते पेट दर्द हो गया। उसके बाद से पापा उसको खुद कॉलेज छोड़कर आने लगे।

एक गलती ने सिखाया जल्दबाजी न करना
नवरात्र चल रहे थे और गुजराती होने के नाते हमारे यहां भी काफी रौनक थी। इसकी तैयारी के लिए काफी समय निकल जाता था। तड़के सुबह आना और शाम को वापस जाना। पूरा दिन कहां निकल जाता पता ही नहीं चलता था। इस व्यस्त दिनचर्या में आम दिनों के काम भी भागते दौड़ते पूरे किए जा रहे थे। ऐसे ही एक दिन सुबह पांच बजे आकर जब हम सोए तो दस बजे नींद खुली। मैं जल्दी-जल्दी सबके लिए ब्रेकफास्ट बना रही थी कि रसोई में पति महोदय की आवाज आई ये कपड़े देने वाले हैं क्या? मैंने भी वहीं से कयास लगाते हुए कि प्रेस वाला होगा बोला हां देने हैं। बात आई गई हो गई। मैं भूल गई थी कि मैंने प्रेस की पोटली टेबल पर रखी हुई है। दूसरे दिन मैंने प्रेस वाले को पूछा कल प्रेस के कपड़े नहीं भिजवाए? बोला कौनसे कपड़े? मैंने कहा जो कल सुबह दिए थे। उसने कहा आपके यहां से तो कोई कपड़े नहीं आए। उसकी बात सुनकर मेरे होश उड़ गए क्योंकि उसमें अच्छे सूट थे जो प्रेस के लिए थे और इन दिनों पहनने थे। मैंने कहा याद करो जो भैया ने दिए थे सुबह। प्रेस वाला बोला मैं तो कल आया ही नहीं था मेरी घरवाली आई थी। अब तो बस कपड़ों की चिंता सताने लगी। पति महोदय घर आए तो मैंने पूछा कल किसको कपड़े दिए थे। बोले ड्राइवर आया था उसको, तुमसे ही तो पूछा था। मुझे याद आया उस दिन कपड़े ज्यादा होने की वजह से कपड़ों की पोटली मैंने दूसरी बना दी थी। इनको लगा कि ये कपड़े ड्राइवर को देने के लिए हैं क्यों कि अक्सर मैं बच्चों के कपड़े छोटे होने पर उनको दे देती थी कि वह अपनी बस्ती में बांट दे। ड्राइवर को फोन किया तो मिला नहीं, दूसरे दिन सुबह जब वो आया तो इन्होंने पूछा कि उस पोटली का क्या किया? वह बोला मैंने बस्ती में दे दी। मिल सकती है क्या? मैंने जल्दी से पूछा? बोला मैडम ट्राई कर लूंगा वैसे मिलना मुश्किल है। मैं सोचने लगी जरा सी कन्यफ्यजन ने मेरा इतना नुकसान करा दिया लेिकन एक सबक भी सिखा दिया कि जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।

हम कितने बेपरवाह होते जा रहे हैं?
दिल्ली-एनसीआर में ट्रैफिक का लोड बढ़ता ही जा रहा है। हर तरफ तेज भागती गाड़ियां और लोग नजर आते हैं। किसी को एक मिनट की फुर्सत नहीं। किसी की एक मिनट में मेट्रो भागी जाती है, तो किसी का पंचिंग टाइम निकल जाता है। कुल मिलाकर सभी भाग रहे होते हैं। हम भी उनमें से ही एक हैं। रोज सवेरे ऑफिस के लिए ऑटो और फिर मेट्रो पकड़ना रुटीन बन गया है। मेट्रो स्टेशन के आसपास एक मिनट भी गाड़ी रुक जाए, तो ट्रैफिक की चिल-पौं शुरू हो जाती है। ऐसे ही एक भागमभाग वाले दिन जब मैं आफिस के लिए वैशाली मेट्रो से कुछ कदम की दूरी पर शेयर ऑटो से उतर रही थी देखा मेट्रो से भागती हुई एक सफेद बिल्ली को कार के नीचे आते देख दिल दहल गया। उस दिन वैशाली मेट्रो स्टेशन के नीचे और दिनों से ज्यादा भीड़ थी। तभी एक रफ्तार में आ रही लंबी गाड़ी के नीचे वो सफेद बिल्ली आ गई। एक पल पहले दौड़ लगा रही थी और दूसरे पल पहिए के नीचे प्राण पखेरू उड़ गए थे। सफेद रंग की बिल्ली, जो दौड़ लगाते हुए रास्ते पर आई थी एक दौड़ती हुई कार के नीचे आ गई। मौत कितने नजदीक रहती है पता चला। उस समय बाज और चिड़िया की कहानी भी याद आ गई। ये वाकया मेरे साथ ही खड़े कुछ और लोगों ने भी देखा, लेकिन उनके रवैये से मैं हैरान रह गई, जो पल में ही मुंह बिदका कर कहते हुए निकल गए ऐसे हादसे तो होते ही रहते हैं, बिल्ली ही तो थी, मर गई। मन ने कहा मर तो हमारी भावनाएं गई हैं, जिन पर किसी भी चीज का असर नहीं पड़ता।

10 नवंबर


जब पहुंचे संगरूर
35 साल पहले की बात है। हमारा स्कूल दोपहर का हुआ करता था इसलिए मैं और छोटी बहन घर पर थीं पापा के साथ। पापा का स्कूल भी दोपहर का था, वे हमें छोड़ते हुए अपने स्कूल जाते थे। मम्मी और जीजी यानी मेरी बड़ी बहन को लेकर सुबह वाली शिफ्ट में जाती थी। एक दिन अचानक से हमारी बड़ी बुआ पंजाब से आई। पापा घबरा गए कि क्या हुआ। पता चला कि किसी ने उनसे मजाक करा और उनको बोला कि फूफाजी के पापा नहीं रहे। बुआ-फूफाजी टैक्सी करके आए, तब पता चला कि वो फर्जी कॉल था। हमारा भी घर बुआ के ससुराल के पास ही था, तो बुआ हमसे भी मिलने आ गई थी और वापस जाने वाली थी। बातों-बातों में बुआ बोली भाई साहब मैं इन दोनों को ले जाउं, टैक्सी में हैं कोई दिक्कत नहीं होगी। मैं तब 8 साल की और छोटी 2 साल की थी। पापा बोले दोनों अभी बहुत छोटी हैं, हम गर्मियों में आएंगे। इधर बुआ कि बात सुनकर छोटी भी जाने के लिए रोने लगी। पापा बोले कि मुझे इनके कपड़े वगैरह भी नहीं पता कि कहां रखें हैं कैसे ले जा पाएगी? सुशीला(हमारी मम्मी) के आ जाने तक रुक जा फिर ले जाना। बुआ बोली रुक तो जाती भाईसाहब पर टैक्सी अभी तो जाने को तैयार है फिर वेटिंग का किराया बढ़ा देगा। इधर फूफाजी बोले आप बच्चों को हमारे साथ जाने दीजिए, कपड़े वगैरह की चिंता मत कीजिए। पापा ने कहा अकेली छोटी तो रह नहीं पाएगी। बुआ बोली मैं दोनों को ले जाने को कह रही हूं। गुंजन बड़ी क्लास में है इसलिए स्कूल मिस करना मुश्किल होगा और वैसे भी वो अभी स्कूल में है, नहीं तो मैं तीनों को ले जाती। खैर हम दोनों बिना किसी तैयारी के जैसे थे वैसे ही गाड़ी में बैठ गए। मम्मी-पापा के बिना हमारा यह पहला ट्रिप था। इधर मम्मी और जीजी घर पहुंचे, तो हम दोनों दिखाई नहीं दिए पापा ने कहा वो तो संगरूर के लिए रवाना हो गए। गाड़ी में बैठते ही कुछ देर तो सो गए और फिर खिड़की से सड़क का नजारा देखने लगे।
उन्होंने रास्ते में हमारे लिए कपड़े वगैरह खरीदे। घर पहुंचते ही मम्मी-पापा की याद सताने लगी। हम दोनों ही बुक्का फाड़ के रोने लगे। वो तो भला था कि दशहरा था तो पास ही रामलीला का मंचन था। बुआ हमें वह दिखाने ले गई। और बाकी दिन उनकी तैयारी की बातें करके हमें बिजी कर देती थी। बुआ की बेटियां हमे व्यस्त करने के नए-नए ढंग आजमाती। कुछ दिनों बाद मम्मी-पापा और जीजी आए, तो हम दोनों ही रोने लगे। पापा भी हमे गले लगाकर रोने लगे। थोड़ी देर बाद सभी का हंसते-हंसते बुरा हाल था कि कैसे हम पिता -पुत्रियों का मिलाप हुआ था।

ऐसे फोन किए कि पापा के होश उड़ गए
ल गभग 30 साल पुरानी बात है जब हम जयपुर में रहते थे। घर में फोन आया, तो जैसे हमें एक खिलौना मिल गया। मम्मी ने एक डायरी रख रखी थी, जिसमें सबके नंबर थे। हम उन नंबर में से जाने पहचाने लोगों को फोन लगा देते। एक बार दिल्ली से ताउजी के बेटे आए और उन्होंने कहा आज तुम लोगों को ऐसी ट्रिक बताता हूं, जिससे तुम बाहर फोन तो करोगे पर बिल नार्मल फोन की तरह ही आएगा। पहले एक स्टेट से दूसरे स्टेट में फोन करने पर काफी खर्चा आता था और उसका प्रोसीजर भी काफी लंबा रहता था। हम बहनें खुश हो गई। दोचार बार उन्होंने फोन लगाना सिखाया और फिर हमने ट्राई किया। अब तो हमने अपनी दिल्ली में बैठी चाची को, बरेली में रह रही चाची को फोन लगाया और कुछ मजेदार रेसिपी पूछने लगे।
उन्होंने कहा मम्मी कहां है? हमने कहा मम्मी स्कूल गई हैं और हमें भूख लग रही है कोई जल्दी बनने वाली चीजों की रेसिपी बता दीजिए? उन्होंने कहा तुम लोग एसटीडी पर बात कर रहे हो पर हमने झूठ बोल दिया कि यह एसटीडी फ्री है। खैर उन्होंने हमें रेसिपी बताई और हमने उसको ट्राई भी किया। दो-तीन बार ऐसा होने के बाद चाचा ने पापा को फोन करके हमारे फोन करने की बात बताई। पापा चौंकते हुए बोले अरे फोन लगाना आसान नहीं है। क्योंकि फोन लगाने के लिए फोन विभाग में बात करनी होती थी और भी कई चीजें होती थी। उन्होंने हमसे पूछा कि तुमने ये सब कैसे किया, तो हमने उन्हें भाई की ट्रिक वाली बात बताई। उस दिन पापा ने सख्त आवाज में सिर्फ यही कहा आगे से ऐसा नहीं करना। अगले महीने, जो बिल आया, तो उसको देखकर सबके होश उड़ गए। पापा ने हमें बुलाकर कहा देखो, जो फ्री के फोन तुम कर रहे थे उनका बिल। तब वह बिल 3 हजार के लगभग आया था, जिसे देखकर हमारे होश उड़ गए। उसके बाद से ऐसी कोई भी ट्रिक नहीं करने की कसम खाई।

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ठंडी हवा का झोंका