मेरी एक दोस्त का फोन आया। काम की और आपाधापी के बीच इस दौर में चल रही परिशानियों पर चर्चा शुरू हो गई। परेशान होते हुए बोली क्या करूं यार ये मानते ही नहीं वेब सीरीज देखे जा रहे हैं। बच्चे भी साथ में बैठे होते हैं। कई बार मना कर चुकी पर मुझसे कहते हैं तुम पुरानी सदी की हो, तो बच्चों को तो इस सदी में जीने दो। उससे बात करने के बाद मैं भी सोचने लगी कि हम नयापन औ खुलेपन के नाम पर बच्चों को क्या दे रहे हैं।
जी हां इन दिनों बच्चों में दिख रहे बदलाव फूहड़पन की ओर ही अग्रसर होते नजर आ रहे हैं। बच्चों को खुलेपन के नाम पर दी जा रही छूट और आजादी उन्हें गुमराह कर रही है। परिवार में आंख की शर्म मानो एक हिन्दी की कहावत बनकर रह गया है। इसके मायने क्या है? सरोकार क्या है उनसे कोई लेना देना नहीं। लॉकडाउन में जहां लोगों को परिवार के साथ रहने का मौका मिला है वहीं कुछ लोग इसकी वजह से बुरे दौर से भी गुजर हैं। गरीबों के लिए यह आपदा भयावह संकट खड़े कर रही है। वहीं मिडिल क्लास परिवारों के लिए भी यह दौर आर्थक मंदी के साथ ही मानसिक विघटन का दौर चल रहा है। अपनी कुंठा को दूर करने के लिए वेब सीरीज और वेब फिल्में ही उनका सहारा बन रही हैं।
इनमें परोसे जा रहें कंटेट किसी को भी बिगाड़ने में सक्षम हैं। वही बच्चे तो कच्ची मिट्टी जैसे होते हैं जैसा बनाओगे वैसा बनेंगे। परिवार के चार लोग और चारों अपने मोबाइल, टैब, कम्प्यूटर और लैपटाप या डेस्कटॉप पर व्यस्त हैं। कौन क्या देख रहा है कि फुर्सत ही नहीं है। बच्चों की चल रही ऑनलाइन पढ़ाई में बच्चों को मोबाइल के इस्तेमाल की छूट मिल रही है। वहीं कई जगह इसकी साइड में बच्चे गेम भी खेल रहे हैं।
इसका ही ताजा तरीन उदाहरण था 'बॉय रूम कांड'। जो जितनी तेजी से नजर में आया था उतनी ही तेजी से निकल भी रहा है। इस पर हमारा ढीला रवैया कहीं दिमागी वायरस न फैलादे। वेबसीरीज जिन्होंने लोगों को ओपन एरिया दे दिया है। बच्चे भी और बड़े भी खुलकर वेबसीरीज देखने में लगे हैं। इन वेब सीरीज पर सरकार का कोई बैन नहीं होने से ये पूरी तरह खुलकर हर चीज पेश कर रही हैं। खुलकर गालियां हो या सेक्स इनमें आम हो गया है। मारना काटना और पीटना तो इसमें बाएं हाथ के खेल दिखने लगे हैं। मानसिक गंदगी फैलाने का जरिया बन गया है वेब सीरीज का माध्यम। ऐसा नहीं है कि सारी ही वेब सीरीज गंद फैला रही है पर जहां अच्छी दस प्रतिशत है तो बाकी 90 प्रतिशत तो दिमाग में कूड़ा करकट ही भर रही हैं। लॉकडाउन में बंद घर में बच्चे बड़े सब इनको देखने में लगे हैं। बच्चे और बड़े अपने अपने फोन और लैपटॉप को लेकर क्या देख रहे हैं किसी को किसी से मतलब नहीं है। कई जगह तो साथ में भी देखने कोई गुरेज नहीं क्योंकि हम नहीं देखेंगे तो दुनिया रुक थोड़े ना जाएगी जैसे तर्क देने लगते हैं। हिंसक गेम्स और वेब सीरीज ने यंग जेनरेशन को पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया है।
ऐसे में क्या हमारा कर्तव्य नहीं बनता कि एक बार फिर से इस पर गौर किया जाए कि खुलेपन के नाम पर हम बच्चों को क्या सर्व कर रहे हैं। उनके दिमाग के खुलने के नाम पर हम उसमें वायरस डाल कर सड़ा रहे हैं। बच्चों को अच्छी किताबे पढ़ने की आदत डालनी होगी। उनके दिमाग को सही दिशा में मोड़ने का काम करना होगा। ये कठिन है पर शुरुआत तो की ही जा सकती है।
जी हां इन दिनों बच्चों में दिख रहे बदलाव फूहड़पन की ओर ही अग्रसर होते नजर आ रहे हैं। बच्चों को खुलेपन के नाम पर दी जा रही छूट और आजादी उन्हें गुमराह कर रही है। परिवार में आंख की शर्म मानो एक हिन्दी की कहावत बनकर रह गया है। इसके मायने क्या है? सरोकार क्या है उनसे कोई लेना देना नहीं। लॉकडाउन में जहां लोगों को परिवार के साथ रहने का मौका मिला है वहीं कुछ लोग इसकी वजह से बुरे दौर से भी गुजर हैं। गरीबों के लिए यह आपदा भयावह संकट खड़े कर रही है। वहीं मिडिल क्लास परिवारों के लिए भी यह दौर आर्थक मंदी के साथ ही मानसिक विघटन का दौर चल रहा है। अपनी कुंठा को दूर करने के लिए वेब सीरीज और वेब फिल्में ही उनका सहारा बन रही हैं।
इनमें परोसे जा रहें कंटेट किसी को भी बिगाड़ने में सक्षम हैं। वही बच्चे तो कच्ची मिट्टी जैसे होते हैं जैसा बनाओगे वैसा बनेंगे। परिवार के चार लोग और चारों अपने मोबाइल, टैब, कम्प्यूटर और लैपटाप या डेस्कटॉप पर व्यस्त हैं। कौन क्या देख रहा है कि फुर्सत ही नहीं है। बच्चों की चल रही ऑनलाइन पढ़ाई में बच्चों को मोबाइल के इस्तेमाल की छूट मिल रही है। वहीं कई जगह इसकी साइड में बच्चे गेम भी खेल रहे हैं।
इसका ही ताजा तरीन उदाहरण था 'बॉय रूम कांड'। जो जितनी तेजी से नजर में आया था उतनी ही तेजी से निकल भी रहा है। इस पर हमारा ढीला रवैया कहीं दिमागी वायरस न फैलादे। वेबसीरीज जिन्होंने लोगों को ओपन एरिया दे दिया है। बच्चे भी और बड़े भी खुलकर वेबसीरीज देखने में लगे हैं। इन वेब सीरीज पर सरकार का कोई बैन नहीं होने से ये पूरी तरह खुलकर हर चीज पेश कर रही हैं। खुलकर गालियां हो या सेक्स इनमें आम हो गया है। मारना काटना और पीटना तो इसमें बाएं हाथ के खेल दिखने लगे हैं। मानसिक गंदगी फैलाने का जरिया बन गया है वेब सीरीज का माध्यम। ऐसा नहीं है कि सारी ही वेब सीरीज गंद फैला रही है पर जहां अच्छी दस प्रतिशत है तो बाकी 90 प्रतिशत तो दिमाग में कूड़ा करकट ही भर रही हैं। लॉकडाउन में बंद घर में बच्चे बड़े सब इनको देखने में लगे हैं। बच्चे और बड़े अपने अपने फोन और लैपटॉप को लेकर क्या देख रहे हैं किसी को किसी से मतलब नहीं है। कई जगह तो साथ में भी देखने कोई गुरेज नहीं क्योंकि हम नहीं देखेंगे तो दुनिया रुक थोड़े ना जाएगी जैसे तर्क देने लगते हैं। हिंसक गेम्स और वेब सीरीज ने यंग जेनरेशन को पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया है।
ऐसे में क्या हमारा कर्तव्य नहीं बनता कि एक बार फिर से इस पर गौर किया जाए कि खुलेपन के नाम पर हम बच्चों को क्या सर्व कर रहे हैं। उनके दिमाग के खुलने के नाम पर हम उसमें वायरस डाल कर सड़ा रहे हैं। बच्चों को अच्छी किताबे पढ़ने की आदत डालनी होगी। उनके दिमाग को सही दिशा में मोड़ने का काम करना होगा। ये कठिन है पर शुरुआत तो की ही जा सकती है।
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