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मर गए हैं इमोशन?

दिल्ली-एनसीआर में ट्रैफिक का लोड बढ़ता ही जा रहा है। हर तरफ तेज भागती गाड़ियां और लोग नजर आते हैं। किसी को एक मिनट की फुर्सत नहीं। किसी की एक मिनट में मेट्रो भागी जाती है, तो किसी का पंचिंग टाइम निकल जाता है। कुल मिलाकर सभी भाग रहे होते हैं। हम भी उनमें से ही एक हैं। रोज सवेरे ऑफिस के लिए ऑटो और फिर मेट्रो पकड़ना रुटीन बन गया है। मेट्रो स्टेशन के आसपास एक मिनट भी गाड़ी रुक जाए, तो ट्रैफिक की चिल-पौं शुरू हो जाती है। ऐसे ही एक भागमभाग वाले दिन जब मैं आफिस के लिए वैशाली मेट्रो से कुछ कदम की दूरी पर शेयर ऑटो से उतर रही थी देखा मेट्रो से भागती हुई एक सफेद बिल्ली को कार के नीचे आते देख दिल दहल गया। उस दिन वैशाली मेट्रो स्टेशन के नीचे और दिनों से ज्यादा भीड़ थी। तभी एक रफ्तार में आ रही लंबी गाड़ी के नीचे वो सफेद बिल्ली आ गई। एक पल पहले दौड़ लगा रही थी और दूसरे पल पहिए के नीचे प्राण पखेरू उड़ गए थे। सफेद रंग की बिल्ली, जो दौड़ लगाते हुए रास्ते पर आई थी एक दौड़ती हुई कार के नीचे आ गई। मौत कितने नजदीक रहती है पता चला। उस समय बाज और चिड़िया की कहानी भी याद आ गई। ये वाकया मेरे साथ ही खड़े कुछ और लोगों ने भी देखा, लेकिन उनके रवैये से मैं हैरान रह गई, जो पल में ही मुंह बिदका कर कहते हुए निकल गए ऐसे हादसे तो होते ही रहते हैं, बिल्ली ही तो थी, मर गई। मन ने कहा मर तो हमारी भावनाएं गई हैं, जिन पर किसी भी चीज का असर नहीं पड़ता।

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