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एक गलती ने सिखाया जल्दबाजी न करना


नवरात्र चल रहे थे और गुजराती होने के नाते हमारे यहां भी काफी रौनक थी। इसकी तैयारी के लिए काफी समय निकल जाता था। तड़के सुबह आना और शाम को वापस जाना। पूरा दिन कहां निकल जाता पता ही नहीं चलता था। इस व्यस्त दिनचर्या में आम दिनों के काम भी भागते दौड़ते पूरे किए जा रहे थे। ऐसे ही एक दिन सुबह पांच बजे आकर जब हम सोए तो दस बजे नींद खुली। मैं जल्दी-जल्दी सबके लिए ब्रेकफास्ट बना रही थी कि रसोई में पति महोदय की आवाज आई ये कपड़े देने वाले हैं क्या? मैंने भी वहीं से कयास लगाते हुए कि प्रेस वाला होगा बोला हां देने हैं। बात आई गई हो गई। मैं भूल गई थी कि मैंने प्रेस की पोटली टेबल पर रखी हुई है। दूसरे दिन मैंने प्रेस वाले को पूछा कल प्रेस के कपड़े नहीं भिजवाए? बोला कौनसे कपड़े? मैंने कहा जो कल सुबह दिए थे। उसने कहा आपके यहां से तो कोई कपड़े नहीं आए। उसकी बात सुनकर मेरे होश उड़ गए क्योंकि उसमें अच्छे सूट और पोशाकें थीं जो प्रेस के लिए थे और इन दिनों पहनने थे। मैंने कहा याद करो जो भैया ने दिए थे सुबह। प्रेस वाला बोला मैं तो कल आया ही नहीं था मेरी घरवाली आई थी। अब तो बस कपड़ों की चिंता सताने लगी। पति महोदय घर आए तो मैंने पूछा कल किसको कपड़े दिए थे। बोले ड्राइवर आया था उसको, तुमसे ही तो पूछा था। मुझे याद आया उस दिन कपड़े ज्यादा होने की वजह से कपड़ों की पोटली मैंने दूसरी बना दी थी। इनको लगा कि ये कपड़े ड्राइवर को देने के लिए हैं क्यों कि अक्सर मैं बच्चों के कपड़े छोटे होने पर उनको दे देती थी कि वह अपनी बस्ती में बांट दे। ड्राइवर को फोन किया तो मिला नहीं, दूसरे दिन सुबह जब वो आया तो इन्होंने पूछा कि उस पोटली का क्या किया? वह बोला मैंने बस्ती में दे दी। मिल सकती है क्या? मैंने जल्दी से पूछा? बोला मैडम ट्राई कर लूंगा वैसे मिलना मुश्किल है। मैं सोचने लगी जरा सी कन्यफ्यजन ने मेरा इतना नुकसान करा दिया लेिकन एक सबक भी सिखा दिया कि जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।

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