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वो बारिश का पानी

 ये 90 के दशक की बात है।  मेरी मां के साथ बीएड करने वाली एक सहेली थीं जिन्होंने जयपुर के पास एक फॉर्म हाउस बनवाया था। वैसे तो आंटी जयपुर में ही रहती थीं पर गर्मियों में कुछ समय के लिए वहाँ शिफ्ट हो जाती थीं। फॉर्म हाउस की देखभाल के लिए एक भैया थे जो उनके फॉर्म हाउस की देखभाल के साथ जब वो जाती थीं तो खाना पीना भी बना दिया करते थे। वहाँ उन्होंने अपनी जरूरत भर का रहने का भी बंदोबस्त किया हुआ था। कई बार बुला चुकीं थीं माँ को सुशीला समय निकाल कर आओ तो सही। एक बार मम्मी और उनकी एक और सहेली ने मिलकर उनके यहाँ जाने का प्रोग्राम बनाया। मैं और मम्मी। दूसरी आंटी और उनकी दो बेटियाँ। हम सब उन आंटी के फॉर्म हाउस पर पहुँचे। दोपहर का समय था। चारों और खेत ही खेत थे। रिहाइश न के बराबर थी। अंदर गये तो एकदम से जैसे मौसम बदल गया।  चारों और पेड़ लगे हुए थे पेड़ों के बीच से अंदर जाता हुआ रास्ता सूखे प्रदेश में तरावट दे रहा था। गर्मी भी पड़ने लगी थी पर उस समय वहाँ वो बिल्कुल महसूस नहीं हो रही थी। आंटी ने हम सबको अंदर बिठाया उन भईया ने सबको पानी लाकर पिलाया। पानी ऐसा कि पीने के बाद पेट फुल हो गया लेकिन मन अभी तृप्त नहीं हुआ था। घर से खाकर चले थे तो इसलिए ऐसी भूख लग नहीं रही थीं। आंटी ने बोला तो सबने थोड़ी देर बाद खाएंगे ऐसा बोल कर मना  कर दिया। आंटी ने भईया को बोल इन लोगों को फॉर्म हाउस दिखा दो और आसपास की जगह भी।

मम्मी और दोनों आंटी अपनी पुरानी दिनों को याद करके बतियाने लगीं और हम तीनों उन भैया के साथ छोटे से सफर पर निकल गए।

न..  न..  झोला नहीं लिया था।

पहले उन्होंने हमें फॉर्म हाउस दिखाया जहां आम, आंवले, नींबू  और अमरूद के पेड़ लगे थे जो मुझे याद हैं। बाकी तो कितने और तरह के फल, फूल और सब्जियाँ और पेड़ लगे थे क्योंकि वहाँ हरियाली भरपूर थी। उन भैया ने अमरूद तोड़कर भी खिलाए। फिर वो फॉर्म हाउस से थोड़ी दूर पर एक नदी जो उस समय नहीं थी को दिखाने ले गये बोले ये “ढूंढ” नदी। मैंने कहा ये तो नाम को साकार कर रही है। ढूंढने से भी नजर नहीं आ रही।  नदी के लिए बनी जगह और उस पर धूप  ने खींची पक्की लकीरें बता रही थीं कि यहाँ कभी नदी हुआ करती थी।

खैर वो और भी थोड़ी दूर घुमाते हुए हमको वापस फॉर्म हाउस पर ले आए। आने के बाद पेट में थोड़ी हलचल हुई । चूहों की खुसुर-पुसुर शुरू हो गई थी। बिल्कुल सही पकड़े पेट में।

आंटी ने नाश्ता लगवाया जो हमने रज के खाया। चाय पी ही रहे थे कि अचानक से मौसम ने करवट ली। और न जाने कहा से घटाटोप काले बादल दौड़ लगाते आए। झमाझम बारिश शुरू हो गई। बारिश हो और हम उसमें भीगे नहीं, ये हो नहीं सकता। फॉर्म हाउस में बारिश के पानी में भीगने का जो मजा उस दिन आया था उसके बाद कभी नहीं आया। हम तीनों ही बिना सोचे समझे पानी में भीगने चले गये। बारिश भी जैसे दिल खोलकर बरसना चाह रही थी। खूब भीगे।

भले ही जॉब शुरू कर दी थी तो उमर के लिहाज से बड़े से हो गए थे। पर हमने उस वक्त उमर को दरकिनार करते हुए बारिश को खूब खिलाया। बारिश भी हमारे साथ मस्ती के मूड में जो आ गई थी।

खैर जब बारिश रुकी तो याद आया कपड़े???

हम सबने एक दूसरे को देखा तो हंसी फूट पड़ी । पहले आज की तरह ऑनलाइन मँगाने का जमाना नहीं था। खैर आंटी ने अपने सूटों में से हम सबको एक-एक सूट दे दिए। हमने फिर एक एक चाय पी। उस कड़क अदरक वाली चाय का स्वाद तो जैसे रूह में समा गया।

तभी बादलों की गड़गड़ाहट हुई और पहले से भी तेज बारिश होने लगी। एक बार फिर हम तीनों कूद पड़े बारिश में बिल्कुल भी याद नहीं रहा की कपड़े नहीं हैं किसी के पास।

खैर खूब नहाए। पैरों से पानी को उछालना था या मिट्टी में छप-छप, सब किया कोई देखने वाला जो नहीं था। इतना सोचने की फुरसत भी नहीं थी। दोनों आंटी और मम्मी तीनों बरामदे में कुसियाँ लगाकर बारिश का और हमारी मस्ती का मजा ले रहीं थीं।

तब ही बारिश रुक गई और एक बार फिर हम आंटी के आगे भीगे हुए, ठिठुरते हुए खड़े हो गए। आंटी मुस्कुराते हुए अलमारी से फिर तीन सूट निकाल कर लाई बोलीं। कुछ दिन पहले बहु बेटा भी रुकने  आए थे और जाते समय कपड़े ले जाना भूल गये। सब कपड़े यहीं रह गये थे। ले जाने के लिए रखे हुए थे देखो अब काम आ गये।  

आंटी ने कहा चलो अब खाना खा लिया जाए।

तभी वो भईया बोले आज तो नदी में भी पानी आ गया होगा।

आंटी बोली हाँ अब तो खूब तेजी से बह रही होगी।

मैंने कहा इतनी सूखी नदी में इतनी-सी देर में कहाँ से इतना पानी आएगा?  मैंने कहा चलो देखकर आते हैं पास ही है अब तो हम तीनों ही चले जाते हैं भैया यहाँ खाने का काम कर रहे हैं।  हमने कहा बस एक बार उसे देख आयें फिर आकर खाते हैं खाना।

हम तीनों एक बार फिर ढूंढ नदी को ढूँढने निकल गये। पर यहाँ का तो नजारा ही बदला हुआ था। नदी जो कुछ देर पहले अपने नाम को सार्थक कर रही थी । अब तो उफान मारती हुई बह रही थी। जहां पानी का नमोनिशाँ नहीं था। वहाँ हिलोरे मारता पानी आगे से आगे बड़े जा रहा था।

कि एक बार फिर जो हुआ उसने हमे हंसने पर मजबूर कर दिया। एक बार फिर धूम धड़ाके से बारिश आ गई और हम जल्दी-जल्दी फॉर्म हाउस तक पहुँचने की कोशिश करने लगे। पर सारी कोशिशें  नाकाम रहीं और हम तरबतर होकर आंटी के सामने खड़े हो गए।

वो बोलीं ही भगवान तुम तीनों लड़कियां कहीं बीमार न पड़ जाओ! इतना भीगे जा रही हो।

अब तो कपड़े भी नहीं बचे हैं। रुको एक बार

उन्होंने अपने रखे हुए सामान में से जैसे-तैसे हम तीनों के लिए कपड़े निकालें और बोली अब कही न  निकलना  क्योंकि अब तो कहीं से नहीं निकल सकते और कपड़े।      

भैया ने  जगरे की दाल बाटी बनाई थी जिसकी सौंधी खुशबू का कहना ही क्या। हमारे पेट ने और हमने जी भर के दाल बाटी को सपेटा। आंटी बोलीं मैं इतने समय से यहाँ आती रही हूँ पर इतनी बारिश कभी नहीं हुई।

बारिश में भीगकर पेट पूजा करके आंटी ने बिस्तर लगवा दिए थे, दोनों आंटी और मम्मी जगे हुए थे।  लाइट गई हुई थी।

आंटी ने कहा ये बहुत अच्छी कहानियाँ सुनाता है उन भईया ने कहानी सुनानी शुरू की हमारी पलकें जो उस समय खुलने में असफल थीं मुँद गईं। सुबह जो नींद खुली बहुत खुशगवार थी।

ऐसा दिन जो कभी सोचा ही नहीं था हमारी यादों में जुड़ गया।

 

@ मेखला  गुप्ता   


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