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सुकून मिल रहा

 


हिन्दुस्तानी कल्चर में समधी का रिश्ता ऐसा है जो साथ तो होता है पर उसमें काफी दूरियाँ रहती है। लेकिन कुछ समय से इन सबसे हटकर एक अलग ही प्यारा सा रिश्ता देखने को मिल रहा है। वो सुमधुर रिश्ते जो रिश्तों से ज्यादा गाढ़ी दोस्ती के हैं। जिनमें न लड़की वाले होने का डर, न  लड़के वालों की ठसक। सब स्वप्नलोक सा बच्चे भी खुश, बड़े भी खुश। अगर रिश्तों में ऐसी मिठास आ जाए तो सच में जिंदगी को और क्या चाहिए? कुछ ऐसे ही प्यारे रिश्तों की झलक जिन्हें शब्दों में पिरोते हुए भी बहुत सुकून मिल रहा है। 

एक परिवार ऐसा जिसने देखा महसूस किया कि जिंदगी में इतनी प्यारी फैमिली नहीं देखी। हर कोई सास ससुर, नन्द और दामाद सारे सोने की खान से निकले एक से बढ़कर एक। लड़की और उसकी माँ के लिए उन्होंने जो किया और वो हँसते हुए प्यार से न कोई ठसक न कोई अभिमान। 

एक दूसरा अनुभव 

भाभी के लिए नन्द का विचार : भाभी को उसके भाई की शादी में काम करने देने के लिए फ्री करते हुए नन्द। 

अरे सुम्मी ये क्या तूने सूट पहन लिया? तूने तो आज के फंक्शन के लिए साड़ी तैयार करवाई थी ना?मामी  ने सुमिता को सूट में देखकर टोका!

हां मामी की थी पर जब भाभी को काम करने में दिक्कत आते नजर आई तो सूट पहन लिया जिससे परी को संभाल पाऊँ। भाभी परी को संभालेगी तो वो अपने मम्मी पापा के साथ अच्छे से काम नहीं कर पायेंगी। और भाभी के अलावा परी को गोदी में लेने का एक ही तरीका है कुछ ऐसा हो जिसमें वो बिजी हो जाए इसलिए मैंने सूट पहन लिया। इसमें लगे बीड्स इसे बहुत अच्छे लगते हैं। भाभी भी फ्री होकर मयंक की शादी में काम कर पाएंगी| अंकल आंटी के कामों में हाथ बटाने में आसानी रहेगी |  वो बात खत्म करके सुम्मी तो परी को लेकर आगे बढ़ गई और मैं सोचने पर मजबूर हो गई कि जो अपनी भाभी के लिए इतना सोच रही है तो उनके रिश्ते मजबूत तो होना लाजमी है|

अपनी भाभी के लिए नन्द के मन के विचार तो खुश कर ही गये पर जब सास और ससुर जी को भी काम में लगा हुआ देखा तो जैसे दिल में ठंड सी पड़ गई। कुछ लोग तो ये समझ ही नहीं पाए कि ये उनकी बेटी के सास ससुर हैं। उसके बाद भी जब बच्चे अपने अपने घरौंदे में लौट गए तो चारों की समधी-समधन जो सैर पर निकले तो कहने ही क्या बच्चों ने चारों के घूमने का प्रबंध किया तो लगा ये बदलाव अच्छा है। 

वही एक दूसरी समधियों की जोड़ी जो कहने को तो रिश्ते में समधी थे पर जो नहीं जानता उनको ये जोड़े दो दोस्तों के लगते थे। एक दूसरे का ख्याल रखना और जरूरतों को समझना जैसे बस शब्द ही कम पड़ जाएँ।  

ये भी पहले वाले जोड़ों की तरह बेटा बहु जब विदेश चले गये तो चारों एक साथ घूमने फिरने लगे।  बहु-बेटा कहें या बेटी-दामाद वो भी इतने प्यारे कि दूर देश में बैठकर चारों का ऐसे ख्याल रखते कि उनके आसपास ही हों। घूमने के लिए कब-कब, कहाँ-कहाँ जाने का उन चारों का मन है वो पढ़ लेते और उनकी टिकट और बाकी के अरेंजमेंट कराते। कैब भी कभी न मिले तो वहाँ से वो कैब बुक कराना। उनको क्या-क्या और कहाँ-कहाँ शॉपिंग करनी चाहिए सब जैसे बच्चे वही से बैठकर ध्यान रखते हैं। इसमें कहीं भी अतिश्योक्ति नहीं है। कम ही लिखा है। बच्चे उधर फ्री होकर अपने कामों में लगे थे। परिवार बढ़ाने के समय बच्चों को जरूरत पड़ने पर एक-एक करके दोनों जोड़े उनके पास जाते। न कोई शिकवा, न शिकायत। न लोगों के कहने सुनने का डर। पर कहते हैं न इतने प्यारे लोगों को भी नजर लग गई। परिवार को एक झटका लगा पता चला लड़के की माँ को कैंसर है, कैसे संभाले सारा काम। बेटे को फोन किया तो उसने भी आने के लिए बोला पर उसके आने में भी समय तो लगता ही। खैर बात समधन और समधी तक पहुंची। पहले तो दोनों ने नाराजगी जाहिर की कि जब हम यहाँ हैं तो पहले फोन हमे करना चाहिए था। आपने हमे पराया बना दिया। जब घूमने फिरने में हम सब साथ थे तो जरूरतों में भी साथ हैं। आप चिंता मत कीजिए सब ठीक हो जाएगा। गीता बेन और रसोड़े की जिम्मेदारी मेरी आप चिंता मत कीजिए गीता बेन जल्दी ही ठीक हो जाएंगी। जीतू भाई मैं और देवेश देख लेंगे आप परेशान न हों। 

गीता बेन(लड़के की माँ ) अरे आप कैसे करोगे मीरा बेन मैंने परेश को बोला है वो कर रहा है अरेंजमेंट। 

क्या बात कर रही हो गीता बेन अगर आप की जगह मेरे कोई भाई बहन होते तो क्या मैं यूं छोड़ देती नहीं न। और अब हम भी तो अपने ही हैं। खैर दोनों ने समधी के घर पहुंचकर  सारा काम ऐसे संभाल लिया जैसे बरसों से साथ रह रहे हों। समय-समय पर हॉस्पिटल ले जाने हो या घर के काम काज को संभालना जैसे कामों के साथ उनके बेड पर होने वाले कामों को भी मुस्कुराते हुए करना  बहुत बड़ी बात थी और एक सुखद बदलाव की बयार जो किसी को भी अंदर तक भिगो जाए। 



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