बहुत
हो चुका हिन्दी का रुदन
अब
ना यह विलाप सह पाउंगी
हिन्दी
है माथे की बिंदी
माथे
पर उसे सजाउंगी
हां
कुछ समय की मार थी
हिन्दी
लग रही लाचार थी
पर
अब उसके उठने की बारी है
उसे
जिताने की हम सबकी जिम्मेदारी है|
हिन्दी
में बोलना और लिखना,
कोई
कमजोरी नहीं, हमारा
शौक है
अंग्रेज़ी
न आने का अब नहीं कोई खौफ है
माना
अंग्रेजी एक भाषा है जिसने दुनिया को
बाँधा है
पर
हमारी हिन्दी ने दिया उसे भी कांधा है
हिन्दी
की बेचारी और लाचारी का रोना,
अब
हिन्दी वालों को ही बंद करना होगा|
अपनी
भाषा का गर न कर पाए सम्मान
तो
इसमें अपना ही है अपमान |
जब
दर्द होता है तो माँ ही निकलता हैं मन से
मदर
नहीं आता है मुंह में|
डर
लगता है तो बाबा याद आता है
फादर
और डैड भुला जाता है
विदेशों
से ही ले लो थोड़ा ज्ञान
देखो
हर देश बोलता है अपनी जुबान
गर्व
हैं उनको अपनी भाषा पर
तो
तुम क्यों भूले हो अपने देश की भाषा को
हिन्दी
को भी दुलरालो जरा,
उसके
असली मुकाम पर पहुंचा दो जरा|
@ मेखला
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