मम्मा आप बिना मोबाइल के कैसे रहते थे। क्या तब टीवी पर चैनल भी नहीं आते थे। आप लोग तो बोर हो जाते होगें ना। बच्चों के ऐसे प्रश्नों पर हां हूं करते हुए मैं सोचने लगी कि हमने वक्त के साथ कितना कुछ खोया है। नया पाया जरूर है पर उसकी कीमत बहुत ज्यादा दे दी है।
कॉंकरीट के फैलते जंगलों ने प्रकृति को अनेदखा कर दिया है। वो नीला साफ आसमान, वो रात में टिमटिमाते तारों की चादर कोसों दूर हो गई है। पहले चारों ओर पंछियों की गूंज सुनाई देती थी वहीं अब कोई पंछी चहचहाता है तो बच्चे कहते हैं मॉम देखो बर्ड। सही भी है जिन्होंने अपनी कोर्स बुक में ही बर्ड देखी हो तो ओरिजनल देखकर खुशी तो होगी ही। पहले पानी खरीदकर पीना नहीं पड़ता था पर अब पानी की बूंद-बूंद बिकती है। पहले प्याऊ पर बैठे बाबा या कोई और बड़े प्यार से जब कहते थे थोड़ा सांस ले लो फिर पानी पीना एकदम से पसीने में पानी मत पिओ तो लगता था घर के ही बुजुर्ग हैं। प्यास तो दूर करते ही थे साथ ही मन को भी संतुष्टि देते थे। मन में किसी बाहर वाले का खौफ नहीं था सब अपने से होते थे। आज भी कुछ गांवों में यह अपनापन देखने को मिल जाए पर शहरों में तो इस अपनेपन को भी शक की चादर ने अपने में ढक लिया है। गर्मी में चलने पर भी मन इतना थकान महसूस नहीं करता था क्योंकि पेड़ों की ठंडी छांव गर्मी का तीखापन सोख लेती थी। कुल मिलाकर उन दिनों का स्वाद इन दिनों में कभी नहीं मिल सकता।
जब पड़ौसी भी चाची, ताई और मामा के रिश्तों में बंधे होते थे। पड़ोस की दीदी से कहानियां सुनते सुनते उनके साथ सो जाना किसी को बुरा नहीं लगता था। सुबह उठाकर मां के पास सुला आना और प्यार से खाना खिलाना। जरूरत के वक्त एक दूसरे के लिए खड़े रहना सही मायने में पड़ोसी धर्म निभाया जाता था। आज भी याद है जब हमारी छोटी बहन होने वाली थी और घर में बड़ा कोई नहीं था। पापा परेशान हो रहे थे कि कैसे सब मैनेज करेंगे तो पड़ौस वाली जीजी (जिनको सब जीजी ही बुलाते थे) ने कहा मास्टर जी परेशान मत हो सब ठीक होगा। अपनी लड़कियों को समझाते हुए कि इसका ध्यान रखना और मैं मास्टरनी जी के संग अस्पताल जा रही हूं। (मम्मी-पापा मोहल्ले में मास्टरजी और मास्टरनी जी के नाम से बुलाए जाते थे)। पूरी रात मां के साथ अस्पताल में बिताई। पापा को ये कहकर तसल्ली देना कि मास्टरजी चिंता कोनी कीजो माहरे पास पिस्यां भी हैं। चलते टाइम बटुआ धर ली थी मैं। उनकी बातें आज भी याद दिला जाती हैं उस अपनेपन की उस गर्माहट की जो रिश्तों में बुनी हुई थी।
अब तो रिश्ते भी कपड़े जैसे होने लगे हैं बस दिखावे के। गर्मियों में जब सब घर पर आते तो पड़ौसी भी हालचाल पूछने आते। जरूरत पड़ने पर अपने घर के बिस्तर भी शेयर करने में कोई झिझक या परेशानी नहीं थी। बल्कि कहा जाता था कि कोई जरूरत हो तो बताना जरूर जैसे आपके मेहमान वैसे हमारे। छोटी मोटी कमियां पता ही नहीं चलती थी। बच्चों में मिलबांट कर जीने की आदत अपनेआप ही आ जाती थी। खेल भी तो ऐसे ही थे जो साथ मिलकर खेले जाते थे। न मोबाइल, न टेब। खुशियों की बरसातें हुआ करती थी तब हर मौसम में मौसम का मजा लिया जाता
था।
अब तो एसी ने सारे मौसम का मन ही मार दिया सर्दी में कमरों में बंद रहकर गर्मी का अहसास और गर्मी में कमरों में ठंडक का माहौल मतलब जिंदगी कमरों में बंद हो गई है। चार दीवारों से बाहर निकलते ही मौसम हमारा हालचाल लेने लगता है। क्यों तुमने हमारे एरिया में कैसे एंट्री मारी?
कॉंकरीट के फैलते जंगलों ने प्रकृति को अनेदखा कर दिया है। वो नीला साफ आसमान, वो रात में टिमटिमाते तारों की चादर कोसों दूर हो गई है। पहले चारों ओर पंछियों की गूंज सुनाई देती थी वहीं अब कोई पंछी चहचहाता है तो बच्चे कहते हैं मॉम देखो बर्ड। सही भी है जिन्होंने अपनी कोर्स बुक में ही बर्ड देखी हो तो ओरिजनल देखकर खुशी तो होगी ही। पहले पानी खरीदकर पीना नहीं पड़ता था पर अब पानी की बूंद-बूंद बिकती है। पहले प्याऊ पर बैठे बाबा या कोई और बड़े प्यार से जब कहते थे थोड़ा सांस ले लो फिर पानी पीना एकदम से पसीने में पानी मत पिओ तो लगता था घर के ही बुजुर्ग हैं। प्यास तो दूर करते ही थे साथ ही मन को भी संतुष्टि देते थे। मन में किसी बाहर वाले का खौफ नहीं था सब अपने से होते थे। आज भी कुछ गांवों में यह अपनापन देखने को मिल जाए पर शहरों में तो इस अपनेपन को भी शक की चादर ने अपने में ढक लिया है। गर्मी में चलने पर भी मन इतना थकान महसूस नहीं करता था क्योंकि पेड़ों की ठंडी छांव गर्मी का तीखापन सोख लेती थी। कुल मिलाकर उन दिनों का स्वाद इन दिनों में कभी नहीं मिल सकता।
जब पड़ौसी भी चाची, ताई और मामा के रिश्तों में बंधे होते थे। पड़ोस की दीदी से कहानियां सुनते सुनते उनके साथ सो जाना किसी को बुरा नहीं लगता था। सुबह उठाकर मां के पास सुला आना और प्यार से खाना खिलाना। जरूरत के वक्त एक दूसरे के लिए खड़े रहना सही मायने में पड़ोसी धर्म निभाया जाता था। आज भी याद है जब हमारी छोटी बहन होने वाली थी और घर में बड़ा कोई नहीं था। पापा परेशान हो रहे थे कि कैसे सब मैनेज करेंगे तो पड़ौस वाली जीजी (जिनको सब जीजी ही बुलाते थे) ने कहा मास्टर जी परेशान मत हो सब ठीक होगा। अपनी लड़कियों को समझाते हुए कि इसका ध्यान रखना और मैं मास्टरनी जी के संग अस्पताल जा रही हूं। (मम्मी-पापा मोहल्ले में मास्टरजी और मास्टरनी जी के नाम से बुलाए जाते थे)। पूरी रात मां के साथ अस्पताल में बिताई। पापा को ये कहकर तसल्ली देना कि मास्टरजी चिंता कोनी कीजो माहरे पास पिस्यां भी हैं। चलते टाइम बटुआ धर ली थी मैं। उनकी बातें आज भी याद दिला जाती हैं उस अपनेपन की उस गर्माहट की जो रिश्तों में बुनी हुई थी।
अब तो रिश्ते भी कपड़े जैसे होने लगे हैं बस दिखावे के। गर्मियों में जब सब घर पर आते तो पड़ौसी भी हालचाल पूछने आते। जरूरत पड़ने पर अपने घर के बिस्तर भी शेयर करने में कोई झिझक या परेशानी नहीं थी। बल्कि कहा जाता था कि कोई जरूरत हो तो बताना जरूर जैसे आपके मेहमान वैसे हमारे। छोटी मोटी कमियां पता ही नहीं चलती थी। बच्चों में मिलबांट कर जीने की आदत अपनेआप ही आ जाती थी। खेल भी तो ऐसे ही थे जो साथ मिलकर खेले जाते थे। न मोबाइल, न टेब। खुशियों की बरसातें हुआ करती थी तब हर मौसम में मौसम का मजा लिया जाता
था।
अब तो एसी ने सारे मौसम का मन ही मार दिया सर्दी में कमरों में बंद रहकर गर्मी का अहसास और गर्मी में कमरों में ठंडक का माहौल मतलब जिंदगी कमरों में बंद हो गई है। चार दीवारों से बाहर निकलते ही मौसम हमारा हालचाल लेने लगता है। क्यों तुमने हमारे एरिया में कैसे एंट्री मारी?

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