मम्मी-पापा दोनों जॉब में थे इसलिए ऊपरी कामों के लिए अम्मा जी आती थीं। एक बुजुर्ग महिला, जिन्हें हम अम्माजी कहते थे हमारे यहां आती थी। मम्मी कई बार उन्हें काम छोड़ने के लिए कह चुकी थीं पर उन्होंने यह कहकर कि बेटा काम करने से हाथ-पैर चलते रहेंगे इसलिए कर रही हूं। इस बात के आगे मम्मी कुछ नहीं कह पाई। अम्मा जी आती अपना काम करती और चली जाती। न उन्हें ज्यादा मांगने की ललक थी न ही कुछ लेती थी। मम्मी कोशिश करती उनको कम से कम काम करवाएं। और अम्मा जी कोशिश करती की ज्यादा से ज्यादा करा जाएं काम। तब आज की तरह इतने रिश्ते रूखे नहीं होते थे।सबके लिए सबके मन में सम्मान होता था, जहां तक मैंने देखा। हां जब मम्मी उन्हें गर्म-गर्म खाना खिलाती थीं, तो बहुत खुश होती थी। एक बार उनकी तबियत खराब हो गई, तो पापा अम्मा जी को घर छोड़कर आए और बोले जब तक आराम नहीं आता आइगा नहीं। दस दिन गुजरे तो मम्मी को अम्मा जी की चिंता हुई और पापा से बोली कि अम्मा जी को देखकर आते हैं। हम उनके घर गए तो देखा नीचे एक कोठरी में बीमार सी बहुत कमजोर हो गई सकुची सी अम्मा जी लेटी थी। उठने लगी तो मम्मी ने लिटा दिया आप आराम कीजिए। कुछ समय से हमारे यहां काम कर रही थी पर कभी उनके बारे में ज्यादा नहीं जाना था। उन्होंने अपने हालातों के बारे में मम्मी को कुछ नहीं बताया था। वो तो कोठरी में घुसते देख उनके सामने वाली पड़ोसन घुस आई और कुछ ही देर में मम्मी-पापा को सब बता गईं। पता चला उनके पति का अच्छा खासा काम था पर एक हादसे में उनकी मौत हो गई। उस हादसे ने अम्मा जी को तोड़ कर रख दिया, लेकिन उन्होंने इसकी आंच कभी बच्चों पर नहीं आने दी। तीन बेटे थे। तीनों को पाला पोसा बड़ा किया अच्छी एजुकेशन दिलवाई। जिसकी बदौलत उनके पास बढ़िया नौकरियां थी और जिस कोठरी में अम्मा जी थी उस तिमंजिला मकान की वो मालकिन थी। लेकिन उनके हिस्से वो काली कोठरी ही थी, जिसमें सांस लेना भी मुश्किल-सा हो रहा था। बच्चों ने उनके साथ धोखा करके मकान अपने नाम करवा लिया था और तीनों बेटों ने अपना अपना हिस्सा ले लिया। मां को नीचे की कोठरी में शिफ्ट कर दिया था। अम्मा जी ने जब इतने कष्टों को झेल लिया था तो इस मुकाम पर आकर वो अपने बच्चों के आगे कमजोर नहीं पड़ना चाह रहीं थीं इसलिए उन्होंने अपने खाने पीने के लिए घरेलु काम करने शुरू किए। पापा ने बच्चों को कुछ कहने के लिए बोलना चाहा तो बोलीं मास्टर (पापा को वो ऐसे ही कहतीं थीं ) रहने दे। अब ज्यादा नहीं है समय और दुर्गति नहीं चाहती। इनके कर्मों का हिसाब ये ही समेटेंगे।
उसके कुछ दिनों बाद पता चला अम्मा जी गोलोक धाम चलीं गईं।

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