Ticker

6/recent/ticker-posts

माँ तो माँ ही होती है

 आज लिखने का मन किया तो.....

माँ तो माँ होती है,

जो जिन्दगी सांसों में बसी होती है

पास हो या दूर, रूह में तो महसूस होती है|



मां की यादों को किस्सों में नहीं समेटा जा सकता क्योंकि वो अहसास होता है जो हरदम आपके पास होता है। और ना ही उनको एक दिन के प्यार में सरोबार किया जा सकता है ऐसा मुझे लगता है( क्यों कि हिन्दुस्तान में अभी ऐसे दिन नहीं आए हैं कि मां-बाप बच्चों से दूर रहते हों। हमारे यहां तो मां परछाई बनी रहती हैं बच्चों की। मेरी मां भी कुछ ऐसी ही थीं। मुझे याद नहीं कभी मुझे डांटा हो। मेरे लिए वो एक ढाल के जैसी थीं, जिसे किसी को भी मेरे तक आने से पहले सामना करना होता था। दोनों बहनें कई बार गुस्सा भी हो जाती थीं कि कभी तो उसे भी अपने लिए बोलने दो। पर मां तो मां होती हैं। मुझे खाने में धनिया नहीं खाना। दूध मलाई से दूर-दूर तक साबका नहीं है इन सबका ध्यान मेरी मां ने 30 सालों तक ऐसा रखा कि मैं जिंदगी की हकीकत से कोसों दूर रही। मुझे क्या चाहिए? कैसा चाहिए? कितना चाहिए? इसका मुझे इतना ध्यान नहीं होता था जितना उनको और अब मेरी बहनों को रहता है।

मुझे खाने पीने में कोई पूछता तो मैं सीधे-सीधे कहती दस परांठे या दस रोटी खाउंगी। मुझे डर लगता था कम पड़ गया तो क्या होगा? पर मां बताती थी कि ये दो रोटी खाएगी। जहां मां नहीं होती थी वहां बहनें मेरा काम करती थी आंटी ये दो-तीन रोटी खाएगी इससे ज्यादा बिलकुल भी नहीं बनाइएगा। और अब ये भूमिका मेरी बेटी निभा रही है। कहने का मतलब मैं एक ऐसे खौल में सुरक्षित थी, जहां दुनिया के सच मुझसे दूरी बनाएं हुए थे।

मां का मीठा पान आज तक किसी मिठाई से पूरा नहीं हुआ। मीठा पान इतना पसंद था ये मुझे मेरी मां ने ही याद दिलाया था। मुझे मीठा पान अच्छा लगता था। मां मुझे मनाने के लिए, खुश करने के लिए मीठा पान खिलाती थी। उनके इस पान की खुशबू और लाड़ मन के कोने में दुबके बैठे हैं। जिंदगी की आपाधापी में वो समय नहीं मिला जब खुद को खुद के लिए तलाश कर पाती। लेकिन आज सोचा क्यों ना मन के पन्नों को स्याही से रंग दूं। एक बार मां का करवाचौथ का व्रत था और उनको किसी जरूरी काम से बाजार जाना पड़ गया। बहनें भी अपने काम से बाहर गई हुईं थी। मैंने भी सोचा क्यों ना सबको सरप्राइज दे दूं। सो किचन की कमान संभाली। मैंने आकर आलू टमाटर की सब्जी बनाई और पूरियों का आटा लगाकर रखा। थोड़ी पूरियां भी बना डाली की मम्मी को पूजा करनी थी। मम्मी और बड़ी बहन जब घर पर आए तो थकान से चूर हो रहे थे। कुछ ही देर में छोटी वाली बहन भी आई। मम्मी को घर में घुसते ही जब कुछ कुछ रसोई से महक आई तो रसोई में आईं और खुश होते हुए बोलीं अरे बेटा तूने तो कमाल ही कर दिया। मैंने कहा अभी थोड़ा और सरप्राइज बाकी है| पूजा वाले कमरे में गई तो मुझे जितना पता था मैंने तैयारी कर रखी थी। बोली कुछ नहीं, बस आंखों में जो चमक थी वो मुझे आज भी याद है। पुए बनाने रह गए थे तो बस उन्होंने कहा तो मैंने तैयारी कर दी और कुछ ही देर में उन्होंने पूजा कर ली। घर में चारों को जब गरम-गरम पूरी खिलाई तो सब बहुत खुश हुए। क्योंकि मेरा खाना बनाना कभी कभार ही हुआ करता था। हां, राशन लाना है जनरल स्टोर से कुछ सामान लाना है वो काम मैं आसानी से कर देती थी। दूसरे दिन शाम को जब हम से इकठ्ठा हुए तो मां ने चुपके से पीछे मीठा पान मुंह में डालते हुए कहा देख तेरे लिए।

ऐसा ही एक और किस्सा है आगे कि कड़ी में..

Post a Comment

0 Comments

ठंडी हवा का झोंका