सालों
बाद जब पैतृक घर को देखने का मौका मिला तो कुछ वक्त के लिए सब मौन हो गये| सबकी आँखें नम हो गई| आँखों के कोरो को चोरी से पोछ्ते
हुए सब इधर-उधर की बातें करने लगे| वही ताईजी मन ही मन बुदबुदाने लगीं, जैसे सब बिछड़ों
को याद कर रही हों| भले ही हम उस घर में
ज्यादा रह नहीं पाए थे पर पता नहीं क्यों एक जुड़ाव सा महसूस कर रहे थे| साथ में आई
ताईजी की तो जिन्दगी का दूसरा सिरा ही यही से जुड़ा था| ताईजी ने झट से सिर पर पल्ला
रख लिया|
उस
समय हँसते हुए हम बोले अरे, ताईजी ये क्या? अब तो कोई नहीं है ऐसा जिसे देखकर आप
पल्ला करो| कोई भी नहीं है जानने वाला फिर
पर्दा किस लिए?
ताईजी
बोली जमीन तो है ना| बीबी -लाला जी ऊपर से देखेंगे तो क्या बोलेंगे? उनकी आँखों
में नमी और गले में भारीपन महसूस हो रहा था | थोड़ी सी देर बाद बोली मैं यहाँ आई तब
15 साल की थी| ताईजी ने एक बार फिर पल्ले को सँभालते हुए कहा- लोग नहीं पर ये धरती
माँ तो है इन्हें पता है की मैं शादी होकर यहाँ आई थी| इनको लगेगा कोई नहीं देख
रहा तो इसने मेरा मान भी नहीं किया|
पता
है जब ये गली की कच्ची सड़क पक्की सड़क में तब्दील हो रही थी, तब मैं माँ के पास
मुंबई गई हुई थी| तेरे ताऊजी ने चिट्ठी में लिखा था पता है निर्मला जब तक तुम वापस
आओगी गली की सड़क पक्की बन जाएगी|
गली
में घुसते हुए भले ही हमे वो फीलिंग नहीं आई, लेकिन घर को देखकर जरुर सब ताईजी की
भावनाओं को समझने लगे|
उस घर में था हमारे परिवार की खुशियों का खजाना|
उस घर की दीवारों में बीबी के छिले हुए बीजों की महक थी, तो ताउजी के लाये आमों की
खुशबू थी| जिस घर ने पापा के गुस्से को प्यार की झिड़की में बदलते देखा था| वही बुआओं
का बचपन गुजरा था, छोटी बुआ का अल्हडपन उस घर की दीवारों में छुपा था| चाचा का पापा और ताउजी की तेलमालिश करने के लिए आवाज
लगाना | हम बच्चों का ऊपर से लेकर नीचे तक दौड़ लगाना और बीबी का कहना अरे कमबख्तों
गिर जाओगे|
गर्मियों
की छुट्टी में पूरे परिवार का एक जगह जमा होना और पूरे घर में ठहाकों का गूंजना| बैठक
जिसे आज के लोग ड्राइंगरूम भी कह सकते हैं में रखे बड़े से ड्रम से आती कभी आमों और कभी फालसे की खुशबू
| ताउजी का आवाज लगाकर बच्चों को बुलाना और जी भर के आम खिलाना आज भी वो स्वाद
जुबां से गया नहीं| वैसे रसीले फालसे मैंने आज तक नहीं खाए| ठेले पर चाट लेकर जो
भी आते बिना घर पर रुके आगे नहीं जाते| तब प्लेट का सिस्टम भी नहीं छक कर खाओ|
ठेले वाले सभी घरों के सदस्यों को नाम से जानते थे और प्यार से चाट खिलाते | भले ही
तब पैसे ज्यादा न थे, सुविधाओं का भी बोलबाला न था पर उस वक्त जो प्यार की गरमाहट
रिश्तों में थी वो अब कहीं गुम सी हो गई है|
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