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सासू मां की कैरियां


मां तो थीं ही लाड़ करने वाली शादी के बाद सासू मां भी वैसी ही मिली। एकदम प्यारी सी लाड़ लड़ाने वाली। जब वो कहती थी मेरी कल्लो भटियारन तो ऐसा लगता मां ही बोल रही हैं। मेरी मां और मेरी मां जैसी सासू मां दोनों ही मुझे बहुत प्यार करती थीं। मां तो मेरा लिखा पढ़ती और संभाल-संभाल कर रखती थी और सासू मां उनको पढ़-पढ़ कर संभालती थी। जब भी कोई आता तो उसे जरूर बताती थी यह लिखती भी है जरा वो दिखा अपनी फाइल। जब भी कुछ मौका मिलता हम बतिया बनाते। मैं शादी से पहले के किस्से सुनाती तो वो अपने बचपन की यादें बतातीं। जन्माष्टमी पर कृष्ण जी का घर सजाना हो या दिवाली की सफाई सबमें हम बहुत मस्ती करते। सासू मां की कैरिया आज भी याद आती है तो मन में खटमीठा सा अहसास दे जाती है।
गर्मी के दिनों की बात है जब कैरियां आने लगी थी। सासू मां ने पन्ने के लिए कैरी ली। जब कैरी घर में आई तो मुझे और मेरी ननद के बेटे को कैरी की खुशबू ललचाने लगी। सासू मां ने कैरी काटना शुरू किया तो हम दोनों लाइन में लग गए। वो कैरी काटे और हम गड़प कर जाए। खाली कैरी खाई तो बोलीं खाली मत खाओ थोड़ा नमक भी डाल लो। फिर क्या एक कैरी से शुरू हुआ किस्सा छह कैरी खाकर खत्म हुआ मन लेकिन तब भी नहीं भरा। सासू मां की खिलाई वो कैरी आज भी याद आती हैं। उनकेा गठिया था हाथ पैरों में बहुत दर्द रहता था पर मेरे खाने की इच्छा देखकर बोलीं तू खा मैं काट रही हूं। हम दोनों में कुछ तो ऐसा कनेक्शन था जो आज भी मुझे उनके होने का अहसास कराता है

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